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Tuesday, September 20, 2011

Sab Sat: YAAD AATAA HAI GUJARAA JAMAANAA 63

याद आता है गुजरा जमाना 63

मदनमोहन तरुण

सब सत

राँची के जिन लोगों को भूलना असम्भव है उनमें भवभूति जी का महत्वपूर्ण स्थान है। उनसे मेरी मुलाकात एक कविसम्मेलन में हई थी। बाद में उनसे मेरा सम्बन्ध प्रगाढ॰ होगया। वे संस्कृत के अच्छे विद्वान थे और मेरी कविताओं के प्रशंसक। उस समय उनकी अवस्था साठ के करीब होगी।

पंडित भवभूति मिश्र भिन्न प्रकार के विद्वान थे। वे साधक थे तथा अपने उन्हीं अनुभवों को वाणी देते थे ।उनके गले में एक बडा॰ - सा मासा था। वे उसकी ओर इंगित कर यह बताना नहीं भूलते कि 'मैं नीलकंठ हूँ।' वे अत्यंत सहृदय और उदारचेता व्यक्ति थे । उनकी हँसी सामान्य से बहुत भिन्न थी। मैंने वैसी हँसी और किसी की नही सुनी। उनकी हँसी गले तक आती और किसी फटे बाँसकी बाँसुरी की आवाज की तरह बाहर निकलकर वायुमंडल में खो जाती। वे घंटों ध्यान करते थे जिसकी गहराई उनकी आँखों में दिखाई पड॰ती थी। वे आनवाले को एक कप चाय जरूर पिलाते थे। स्वयं चाय प्लेट में उलटकर सुड॰ से पी जाते। फिर एक संतुष्ट हँसी हँसते।

यहीं मेरी मुलाकात मेरे प्रिय मित्र उमानाथइन्द्र गुरु जी से हुई थी।वे भी भवभूति जी के गाँव के पास के थे और उनके सम्बन्धी थे। गुरुजी यद्यपि हमारी ही कक्षा में थे , पन्तु हमसे बहुत सीनियर थे। उन्होंने विषय के चुनाव में एक गलती की थी। उन्होंने हिन्दी साहित्य मुख्य विषय के साथ गणित रख लिया था। वे गणित में कई साल विफल होते रहे। हर किसी ने उन्हें सलाह दी कि वे गणित छोड॰कर कोई अन्य विषय लेलें ।परन्तु , उन्होंने सबको यह कहकर शांत कर दिया कि गणित ने मुझे फेल किया है, मैं इसे पछाडे॰ बिना आगे नहीं जाऊँगा। बाद में उन्होंने गणित को पछाड॰ ही दिया। गुरु जी मेरी जानकारी में अकेले ऐसे व्यक्ति थे जिनकी प्रतिष्ठा पर इन विफलताओं का कोई प्रभाव नहीं पडा॰। अपने विषय का उन्हें गहरा ज्ञान था।उनकेअक्षर मोतिओं जैसे सुडौल होते थे।व्याकरण पर उनका गहरा अधिकार था।वे खादी का सफेद कुर्ता , धोती, बंडी और चप्पल पहनते थे, जो उनके गोरे चेहरे पर खूब फबता था। वे एक सिद्धान्तनिष्ठ व्यक्ति थे।उनकी महत्वाकांक्षा प्राइमरी स्कूल का शिक्षक बन कर बच्चों के जीवन में नयी निष्ठा भरकर देश को सदाचार सम्पन्न नागरिक सौंपने की थी ।गुरुजी बाद में एक हाई स्कूल के शिक्षक हुए। अवश्य ही उनके छात्र सामान्य से बहुत अलग होंगे।गुरू जी अपने गाँव के संत, बाबा परमहंस के भक्त थे।

पंडित भवभूति जी की सारी रचनाएँ इन्हीं बाबा परमहंस जी पर आधारित थीं।बाबा के बारे में वे बताते थे कि वे कहीं से आकर गाँव में जो जम गये सो फिर कहीं नहीं गये।वे कौन हैं , कहाँ के हैं ,कोई नहीं जानता था।वे पूजा - पाठ कुछ नहीं करते थे।जो भी उन्हें प्रणाम करता वे जबाब देते हुऐ गहरी आवाज में कहते -'सब सत्' । उनकी वाणी मे गहरा प्रभाव था।

बाबा की दृष्टि में सत्य – असत्य और अच्छा – बुरा जैसी कोई चीज नहीं होती। जो भी हो रहा है वह सत है। ‘सब सत’ ही उनका दर्शन था।

एक बार एक चोर उनका आशीर्वाद लेने आया। उसने कहा - 'बाबा ! हमारी आज की रात सफलता की रात हो ।' बाबा ने कहा – ‘सब सत’ । चोर उसदिन बाबा की कुटिया की सारी सामग्री उड़ा ले गया।लोगों ने बाबा से पूछा – ‘यह क्या ?’ तो बाबा ने कहा – ‘सब सत।’

बाबा की शास्त्रों में कोई आस्था नहीं थी । जब उनसे कोई शास्त्र की बात करता तो वे पूछते – ‘के लिखले रे , कह।’ अर्थात यह किसने लिखा, यानी यह सब लिखने का अधिकार उसे किसने दिया ? और जो शास्त्रों में लिखा है , वही एकमात्र सत्य हो , इसका क्या प्रमाण है ?

' भवभूति जी की अंतिम पुस्तक ‘बची - खुची सम्पत्ति’ की भूमिका नलिन विलोचन शर्मा जी ने लिखी थी।

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