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Monday, August 8, 2011

Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 37

याद आता है गुजरा जमाना 37

मदनमोहन तरुण

अब यह भी देख लीजिए

उनदिनों लोग अपनी लड॰की के विवाह के लिए उपयुक्त 'वर' की तलाश के लिए जाते थे और लड॰के की शारीरिक , मानसिक , आर्थिक स्थितियों एवं कुल -खानदान की जाँच करते थे।

इसी की उपयुक्तता पर लड॰के की कीमत (दहेज) निर्भर करती थी।

मेरे मित्र की उम्र सोलह साल की हो चुकी थी।विवाह के लिए उसे भी 'देखने' कुछ लोग आए।मित्र ने नैतिक समर्थन के लिए मुझे भी बुला लिआ।उसदिन उसने हर रोज से अच्छे कपडे॰ पहने थे और अधिक सजा - सँवरा था।उसे देखने आनेवाले सज्जन सिल्क का कुर्ता और साफ - सफ्फाक धोती पहने थे।उनके अगले दो दाँत सोने से मढे॰ हुए थे और हाथ में चाँदी की मूठवाली छडी॰ थी।उनकी मूँछें बडी॰ - बडी॰ और रोबदार थीं। वे बार - बार हँसते ताकि उनके सोने से मढे॰ दाँत लोगों को दिखाई पड॰ते रहें और उनका रुतवा जाहिर होता रहे।

उन्होंने मेरे मित्र से पहले उसका नाम पूछा ताकि वे इस बात से सुनिश्चित हो सकें कि उसकी आवाज में कोई खराबी नहीं है। मेरे मित्र ने अपना नाम बताया। फिर उन्होंने अपने थैले से एक मोटी - सी अँग्रेजी की किताब निकाली और कहा - 'इसमें से एक पन्ना पढ॰कर सुनाइए।' मेरे मित्र ने पढ॰कर सुना दिआ।इससे उन्होंने समझ लिआ कि 'लड॰का पढा॰लिखा’ है।इसके बाद उन्होंने मेरे मित्र से जो प्रस्ताव किआ , वह बहुत ही अटपटा था। उन्होंने उससे अपनी कमीज और गंजी उतारने को कहा।मित्र ने बहुत असमंजस के साथ ऐसा किआ।आगन्तुक ने बडे॰ गौर से मित्र की पीठ के चमडे॰ की कई बार छूकर जाँच की कि इन्हें कोई चर्मरोग तो नहीं।फिर अपनी जाँच से संतुष्ट होकर उससे कहा - ' अब आप कपडा॰ पहन लीजिए।' मेरे मित्र के दादाजी वहीं बैठे थे। उन्हें अपने पोते का कमीज निकलवा कर जाँच करना जरा भी पसन्द नहीं आया। वे पूरी तरह नाराज हो चुके थे। जब मेरा मित्र अपनी कमीज पहनने लगा तो दादाजी ने करीब - करीब चिल्लाते हुए उसे रोका - 'ठहरो ! कमीज मत पहनो!' और उसके बाद उसी तरह गरजते हुए उन्होंने आदेश दिआ -'अब अपना पैंट उतार दो !' इस आदेश से मेरा मित्र हक्काबक्का रह गया। मैं स्वयं बहुत स्तंभित था। अतिथि ने कहा - ' नहीं , नहीं , इसकी कोई आवश्यकता नहीं है।' परन्तु दादाजी नहीं रुके। उन्होंने पहले जैसी ही क्रोधभरी आवाज में कहा - 'आवश्यकता है।यह सबसे बडी॰ आवश्यकता है। आखिर आप अपनी लड॰की के लिए यही तो ढूँढ॰ने आए हैं। बाकी सारी चीजें तो औपचारिकता मात्र है। आप मेरे पोते के उस अंग को भी सहला कर , दबाकर जाँच कर लें कि वह आपकी बिटिया के काम का है या नहीं। ' इसके पहले कि आगन्तुक कुछ बोलते और मेरा मित्र कोई निर्णय लेता , उसके दादाजी ने अपना पूरा जोर लगाकर उसका पैंट नीचे की ओर खींच दिआ।अब मेरा मित्र सबके सामने एकदम निठाह नंग-धडं॰ग खडा॰ था।दादा जी ने कहा -' देख लीजिए। इसे भी छू - टटोल कर देख लीजिए।' आगन्तुक ने अपना सिर नीचे झुका लिआ। इसी बीच मेरे मित्र का जो अंग - विशेष, शांत और नमित लटका था , वह उत्तेजना में पूरी तरह खडा॰ हो गया। फिर क्या था, वह जल्दी से अपना पैंट ऊपर की ओर खींचता हुआ तेजी से भीतर कमरे की ओर भागा और मैं भी उसके पीछे -पीछे दौडा॰।

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