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Monday, September 12, 2011

Ram:YAAD AATAA HAI GUJARAA JAMAANAA 57

याद आता है गुजरा जमाना 57

मदनमोहन तरुण

राम और छोटानागपुर के आदिवासी

डॉ. कामिल बुल्के रामायण की कथा के उत्तर पक्ष को वैदिक कथा-प्रतीकों तक खींच ले जाने की आवश्यकता नहीं समझते। आदिवासी जातियों में आज भी कई ऐसी परम्पराएँ सुरक्षित हैं जो इस पक्ष को पूर्णतः लौकिक एवं स्वाभाविक कथा सिद्ध करने में समर्थ है। ’’सबसे स्वाभाविक अनुमान यह है कि आजकल के आदिवासियों के समान उन जातियों के विभिन्न कुल विभिन्न पशुओं और वनस्पतियों की पूजा करते थे। जिस कुल में लोग जिस पशु या वनस्पति की पूजा करते थे, वे उसी के नाम से पुकारे जाते थे।’’-118 वे अपनी बात आगे बढ़ाते हुए लिखते हैं- ’’छोटानागपुर में रहने वाली उरॉंव तथा मुण्डा जातियों में तिग्गा, हलमान, वजरंग और गड़ी नामक गोड मिलते हैं। इन सब का अर्थ बन्दर ही है। सिंह भूमि की भुइयाँ जाति हनुमान के वंशज होने का दावा करते है। वे अपने को पवन-वंश कह कर पुकारते हैं।- 118 इसी प्रकार मैना, उरॉंव और विर्होर जातियों में गिद्ध या गिधि गोत्र होते हैं। ’’हाल ही में मुझे पता चला कि रॉंची जिले के रयडीह थाने के कटकयॉं गॉंव में एक ’रावना’ नामका परिवार अब तक विद्यमान है।’’-119 इन आधारों पर वे अपना मत स्थापित करते हुए लिखते हैं- ’’इन सब बातों को ध्यान में रख कर यह स्पष्ट है कि आदिवासियों का रामकथा के साथ संबंध अवश्य है। ग्ग्ग् तथा यही अधिक संभव है कि रामायण के वानर, ऋक्ष, गीध वास्तव में वानर, ऋक्ष, गीध गोत्रीय आदिवासी थे।’’ 119 वे कुम्भकर्ण, मेघनाद, दशग्रीव, विभीषण, प्रहस्त (लम्बे हाथोंवाला को वर्णनात्मक नाम मानते हैं।)

वाल्मीकीय रामायण के राम में देवत्व से अधिक उनकी मानवीय विशेषताओं पर बल है। उसमें अतिशयोक्ति का प्रयोग कथा के कलात्मक सौकर्य एवं उसकी प्रभाववृद्धि मात्र के लिए कुछेक स्थलों पर अवश्य है, जो राम के व्यक्तित्व को कहीं भी इतना अस्वाभाविक नहीं बनाता कि वे अपरिचित से लगें। वे कर्तव्य प्रेरित निष्ठा से अपने आचरण के हर पक्ष में उदाहरणीय लगते हैं, परन्तु उनमें अपार मानवीय संवेदना है। वे सबल हैं, तो दुर्बल भी। सुदृढ़ हैं, तो समय-समय पर व्यग्र और व्यथित भी। वे भी साधारण आदमी की तरह रो पड़ते हैं। पराजय और खोने की व्यथा उन्हें भी हिला देती है। परन्तु, अपने परवर्ती विकास काल में रामकथा में अलौकिक तत्वों का प्राधान्य होता गया है। अवतारवाद के विकास के साथ-साथ राम विष्णु के बौद्धों में बेधिसत्व तथा जैनों में आठवें बलदेव के रूप में चित्रिात होते-होते नर से नारायण हो गये हैं। डॉ. बुल्के के मतानुसार- ’संस्कृत धार्मिक साहित्य में राम का स्थान अपेक्षाकृत कम व्यापक है। कारण यह है कि एक तो वैदिक साहित्य के निर्माण काल में रामकथा प्रचलित नहीं थी। दूसरे, रामभक्ति की उत्पत्ति के पूर्व जनसाधारण के धार्मिक जीवन में रामकथा के लिए विशेष स्थान नहीं था। वैदिक साहित्य में रामकथा का नितान्त अभाव है।’’ 721.22 रामभक्ति के विकास के साथ-साथ साम्द्रायिक रामायण तथा संहिताओं का प्रचलन हुआ, जिनमें अध्यात्म रामायण, अद्भुत रामायण, आनन्द रामायण, तत्वसंग्रह रामायण आदि उल्लेखनीय हैं। संस्कृत ललित साहित्य के स्वर्णकाल के विशिष्ट कवियों ने रघुवंश, उत्तररामचरित जैसी कालजयी कृतियाँ अवश्य प्रस्तुत थी। आधुनिक भारतीय भाषाओं में कंवनकृत तमिल रामायण, तेलुगु द्विपद रामायण, मलयालम रामचरितम, असमिया माधवकंदली रामायण, बंगाली कृत्तिवास, हिन्दी रामचरित मानस, उड़िया बलरामदास रामायण तथा मराठी में भावार्थ रामायण, कश्मीरी रामायण रामकथा के विकास की महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं, जिन्होंने लोक जीवन को प्रभावित किया।

डॉ. बुल्के के मतानुसार ’’वासुदेव कृष्ण सम्भवतः तीसरी शताब्दी पूर्व से विष्णु के अवतार माने जाने लगे थे, जिससे अवतारवाद की भावना को बहुत प्रोत्साहन मिला था। दूसरी ओर रामायण की लोकप्रियता के साथ-साथ राम का महत्व भी बढ़ने लगा था, उनकी वीरता के वर्णन में अलौकिकता भी आ गयी थी। इस प्रवृत्ति की स्वाभाविक परिणति यह हुई कि कृष्ण की भांति राम भी सम्भवतः पहली शताब्दी ई.पू. के अवतार के रूप में स्वीकृत होने लगे थे।’’-738 परवर्ती रामकथा में कृष्णकथा के कई प्रसंग नाम एवं प्रसंग भेद से सम्मिलित किये गये। कृष्णकथा के रसमय प्रसंगों की चासनी रामकथा में डाली गयी है। यह वही श्रृंखला है जिसमें परवर्ती संस्कृत साहित्य परिबद्ध होकर संकुचित हौर संकीर्ण होता हुआ अपनी मूल गरिमा और विराटता खोकर अपने स्थान से वंचित होता चला गया। राम अपने वनवास के दौरान दण्डकारण्य के कामातुर ऋषियों को यह आश्वासन देने लगे कि वे कृष्णावतार में गोपियों के रूप में आकर उनकी तृप्ति की व्यवस्था करेंगे। (पद्मपुराण, उत्तरखण्ड 272.166.167) बलरामदास रामायण, गर्ग संहिता (गोलोक खंड, अध्याय-4 और माधुर्यखण्ड अध्याय-2, कृष्णोपनिषद् (रामचन्द्रस्य कृष्णावतार प्रतिज्ञा आदि।) इस प्रकार क्षात्र धर्म के कर्तव्यों के प्रति मूलतः समर्पित राम को लीला पुरुष बना दिया गया। डॉ. बुल्के ने रामकथा में कृष्णचरित के परवर्ती विकास को पात्र-साम्य की दृष्टि से इन शब्दों में रखा है- ’’रामकथा के बहुत से पात्रों का संबंध कृष्णचरित के पात्रों से स्थापित किया गया है। राम तथा कृष्ण के अतिरिक्त सीता-सुभद्रा तथा लक्ष्मण-बलभद्र की अभिन्नता का भी प्रतिपादन किया गया है। सीता के विषय में माना गया है कि वह कृष्णावतार में कृष्ण की पत्नी (रुक्मिणी) बन कर दस पुत्री तथा एक पुत्री उत्पन्न करेंगी (आनन्द रामायण 7ए 19ए 138)। इसके अतिरिक्त निम्नलिखित पात्रों की अभिन्नता का उल्लेख मिलता है- मन्थरा-पूतना, शूर्पणखा और कुब्जा, वालि और भील, अयोध्या का धोबी और कंस का धोबी, जाम्बान और जाम्वती का पिता (तत्वसंग्रह रामायण 7ए 15 तथा बलरामदास रामायण) वानर और गोप (आनन्द रामायण 9ए5ए45द्धष्.135 इसके साथ ही रासलीला आदि के अनेकानेक प्रसंग रामकथा से जुड़ते चले गये। दूसरी ओर विकास क्रम में जैसे-जैसे विष्णु ने इन्द्र का, शिव ने ब्रह्मा का स्थानान्तरण किया वैसे-वैसे रामकथा के विविध प्रसंगों में भी ऐसे परिवर्तन आते चले गये। राम ने किसी रामायण में एक ही प्रसंग पर ब्रह्मा की आराधना की, तो किसी अन्य रामायण के उसी प्रसंग में शिव या शक्ति की। भारतीय संस्कृति के विकास की यह एक अलग गाथा है। डॉ. बुल्के ने अपने इस प्रबंध में समय के इन यात्री-पदचिह्नों को बड़ी सावधानी एवं विस्तार के साथ अंकित किया है।

रावण-वध के पश्चात् गर्भवती सीता का राम द्वारा निष्कासन रामकथा के अत्यंत मार्मिक प्रसंगों में है, जो लोक-मानस को उद्वेलित करता रहा है और राम के व्यक्तित्व पर भी अपनी काली छाया डालता रहा है। अनेक कवियों ने समय-क्रम में इसे भिन्न-भिन्न रूपों में प्रस्तुत किया है। अपने अध्ययन में डॉ. बुल्के ने सीता की अग्नि-परीक्षा एवं निष्कासन के प्रसंग में अधिक रुचि ली है, तथा इनसे सम्बद्ध अपने अध्ययन से प्राप्त विविध सामग्री अध्येताओं के लिए प्रस्तुत की है। धोबी का अपनी पत्नी को पीटते हुए सीता पर आरोप लगाने के प्रसंग के साथ-ही-साथ सपत्नियों की प्रेरणा से गर्भवती सीता द्वारा रावण के चरणों का चित्र बनाना एवं बाद में ईर्ष्यालु सपत्नियों द्वारा इसे विज्ञापित कर राम को भड़काना, स्वयम् कैकेयी द्वारा पंखे पर रावण का चित्र बनाकर प्रसुप्ता सीता के वक्ष पर उसे रख देना, सीता का राम समझ कर उसे चूमना, राम का देखना और क्रुद्ध होना, लंका की राक्षसी द्वारा सीता की सहेली बनकर सीता को रावण का चित्र बनाने को प्रेरित करना, आदि के साथ अनेकों ऐसे प्रसंग रखे गये हैं जो लोक-सहानुभूति से निष्पन्न हैं।

रामकथा ने इतिहास और भूगोल की इनकी लम्बी यात्रा की है, नर से नारायण काव्य बनने तक इतने धर्मों, संस्कृतियों, विश्वासों, आस्थाओं से युग-युग में उसका सामना हुआ है कि उसकी कथा में अन्तर-परिवर्तन अस्वाभाविक नहीं कहा जा सकता। इस परिवर्तन पर ’आनन्द रामायण’ के पूर्णकाण्ड, सर्ग सात में बहुत ही सटीक टिप्पणी दी गयी है-

पुनः-पुनः कल्पभेदाज्जाताः श्री राघवस्य च।

अवताराः कोटिशोऽत्रा तेषु भेदः क्वचित्क्वचित।

भिन्न-भिन्न कालों में राम के कोटि-कोटि अवतार हुए हैं अतः इन असंख्य अवतारों के कारण कथा कुछ-कुछ अन्तर-प्रत्यन्तर अस्वाभाविक नहीं।

पहले-पहल बौद्धों ने इस कथा का विदेशों में प्रचार-प्रसार किया। क्रमशः तीसरी और पाँचवी शताब्दी में ’दशरथ-जातक’ का चीनी भाषा में अनुवाद हुआ। तत्पश्चात् नवीं श.ई. में तिव्बती तथा खेतानी रामायणों से उसे उत्तर में फैलने का अवसर मिला। हिन्देशिया तथा हिन्दचीन में वाल्मीकीय रामायण प्राचीन काल से ही ज्ञात है। जावा, कम्बोदिया, स्याम में राम-नाटक आज भी लोकप्रिय हैं। इसके अलावा भारतीय भाषाओं में तमिल, तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, बंगला, असमी, मराठी, उड़िया, गुजराती, उर्दू-फारसी एवं विदेशी भाषाओं में डच, स्पैनिस, फ्रेंच, जर्मन, पुर्तगाली आदि भाषाओं में उपलब्ध अनेकानेक रामकथाओं का अध्ययन-विवेचन प्रस्तुत किया है। इसके अलावा रामकथा की प्रक्षिप्त सामग्री पर विचार करते हुए उन्होंने हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्म तथा अवतारवाद एवं उसके प्रभावों की गहराई से छान-बीन की है, तथा उसके पात्रों एवं कथानक के विविध अंगों पर विपुल सामग्री प्रस्तुत कर उनका विश्लेषण किया है।

इस प्रबंध की अनन्यता का दूसरा क्षेत्र है, रामकथा के प्रमुख एवं गौण पात्रों पर देश-विदेश में प्राप्त सामग्री का विशद संकलन एवं विवेचन। लेखक ने रावण, हनुमान व सीता के साथ परशुराम, शबरी, त्रिजटा, मंदोदरी, विभीषण इन्द्रजित, शत्रुघ्न आदि पात्रों पर भी प्रभूत सामग्री प्रस्तुत की है तथा रावणवध के पश्चात् गर्भवती सीता के वनवास पर तो उसने विविध कथाओं का एक अलग संसार ही खड़ा कर दिया है।

इस प्रबंध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाठक को देश-विदेश, विभिन्न भाषाओं में लिखित-अलिखित रूप से व्याप्त रामकथाओं के विराट धतराल पर ला खड़ा करता है, जहाँ उसे इस कथा के अनेकों क्षितिजों का एक साथ साक्षात्कार होता है।

’अंग्रेजी-हिन्दी कोश’ हिन्दी भाषा को डॉ. बुल्के का दूसरा महत्वपूर्ण अवदान है। प्राक्कथन में स्वयम् उनका वक्तव्य इस कोश की विशेषताओं को स्पष्ट करता है- ’’बारह वर्ष पूर्व (इस कोश का प्रथम संस्करण 1968 में प्रकाशित हुआ था।) मैंने A Technical Hindi –English Glossary प्रकाशित की थी। उस छोटे से कोश का इतना स्वागत हुआ कि मैंने एक सम्पूर्ण अंगरेजी-हिन्दी कोश तैयार करने का संकल्प लिया। यह कोश प्रमुख रूप से हिन्दी सीखने वालों की समस्याएँ दूर करने के उद्देश्य से लिखा गया है फिर भी मुझे आशा है कि यह हिन्दी भाषियों के लिए समान रूप से उपादेय होगा। अनुवादक निश्चय ही इससे लाभान्वित होंगे। इसमें अंगे्रजी के विद्यार्थियों का भी ध्यान रखा गया है। उनकी सुविधा के लिए अंगरेजी शब्दों का उच्चारण हिन्दी में दिया गया है।’’ इन विशेषताओं के साथ ही शब्दों की व्याकरणिक कोटियों का निर्देश किया गया है। हिन्दी सीखने वाले इतर भाषियों को लिंग की समस्या बहुत परेशान करती है। यहां लेखक ने स्त्रीलिंग शब्दों को एक तारक चिह्न एवं उभय लिंगी शब्दों को दो तारक चिह्नों से रेखांकित कर हिन्दी सीखने वालों की बहुत सी समस्याओं के समाधान का प्रयास किया है। यह अंग्रेजी शब्दों का निठाह हिन्दी अनुवाद नहीं है, पर एक व्यावहारिक कोश है जिसमें हिन्दी के सहज स्वाभाविक पर्यायों पर ध्यान दिया गया है।

1 सितम्बर 1909 को वेल्जियम में उत्पन्न पद्मभूषण डॉ. कामिल बुल्के, 17 अगस्त 1982 को अपनी कर्मभूमि भारत में सदा के लिए अमर हो गये ।

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Thursday, September 8, 2011

Ramkathhaa YAAD AATAA HAI GUJARAA JAMAANAA 56

याद आता है गुजरा जमाना 56

मदनमोहन तरुण

‘रामकथा’

डॉ. बुल्के मूलतः विज्ञान और गणित के विद्यार्थी थे, अतः शोध के क्षेत्र में उनकी संधान-दृष्टि प्रमाणजीवी थी और वे तथ्य -परीक्षण के समय, उसे उसकी समग्रता में देखने के पक्षपाती थे, ताकि उसका छोटा-से-छोटा अंश भी छूट न जाए। यही कारण है कि रामकथा पर कार्य करते समय उन्होंने लिखित-अलिखित तथ्यों, साक्ष्यों एवं प्रमाणों का एक विशाल संसार खड़ा कर दिया और उस दिशा में आगामी शोध-संभावनाओं के अनेक नये द्वार उद्घाटित कर दिये।

वे इंजीनियरिंग से बी.एस-सी. थे। लूबेन विश्वविद्यालय से एम.एस-सी. में गणित का अध्ययन करते हुए उन्होंने आइन्स्टाइन के सापेक्षवाद का अध्ययन किया था। तत्पश्चात् उन्होंने दर्शनशास्त्र में एम.ए. किया। 1935 में भारत आने पर उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से संस्कृत, इतिहास, हिन्दी-रचना तथा अंग्रेजी के साथ बी.ए. की परीक्षा पास की। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. की परीक्षा पास करने के बाद, उन्होंने वहीं से डॉ. माताप्रसाद गुप्त जी के निर्देशन में- ’रामकथा: उत्पत्ति और विकास’- विषय पर अपना शोध कार्य समाप्त कर डी.फिल्. की उपाधि प्राप्त की। इलाहाबाद में रहते हुए वे हिन्दी के वरिष्ठ साहित्यकारों के निकट सम्पर्क में आए। 1940 में वे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से मिले और बहुत प्रभावित हुए। निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानन्दन पंत, माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त आदि विभूतियों को उन्होंने निकट से देखा तथा डॉ. धीरेन्द्र कुमार वर्मा एवं डॉ. रामकुमार वर्मा के निकट संपर्क में रहे। डॉ. धर्मवीर भारती एवं डॉ. जगदीश गुप्त उनके सहपाठियों में थे।

डॉ. बुल्के के समग्र लेखन में उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और साहित्य की संवेदनशीलता का गहरा एवं तात्विक संतुलन है। वे उनके लेखन में कभी एक-दूसरे की राह में नहीं आते, वे एक-दूसरे के पूरक की भूमिका में सदैव बहुत बड़े दायित्व का निर्वाह करते हैं। डॉ. बुल्के ने मौलिक, अनुवादित, छोटे-बड़े करीब 28 ग्रंथ एवं अनेक शोध आलेख प्रकाशित किए हैं, जिनमें मातरलिंक के विश्वप्रसिद्ध नाटक ’ब्लू वर्ड’ का ’नीलपंछी’ के नाम से तथा स्वाभाविक हिन्दी में बायबिल का अनुवाद सम्मिलित है। ’मानस-कौमुदी’ में उन्होंने रामचरित मानस के कवित्वपूर्ण एवं अपने प्रिय अंशों का संकलन किया है तथा ’रामकथा और तुलसीदास’ में उन्होंने अपने प्रिय कवि की कृतियों का गहरा मूल्यांकन-विश्लेषण प्रस्तुत किया है। डॉ. बुल्के की प्रतिष्ठा का मूल आधार उनके दो ग्रंथ हैं- रामकथा- उत्पत्ति और विकास’ तथा ’अंगरेजी-हिन्दी कोश’।

’रामकथा-उत्पत्ति और विकास’ हिन्दी-संसार को डॉ. कामिल बुल्के का अप्रतिम अवदान है। यह उनके अगाध अध्ययन, अपने कार्य के प्रति असाधारण निष्ठा, तलस्पशिंनी दृष्टि, अपार तथ्य-मंथन एवं विश्लेषण क्षमता से निष्पन्न अभूतपूर्व महाप्रबंध है। यह अध्ययन चार भागों एवं 21 अध्यायों में विन्यस्त है। प्रथम भाग के अध्ययन का मुख्य विषय ’प्राचीन रामकथा साहित्य’ है जिसका विस्तृत अध्ययन वैदिक साहित्य, वाल्मीकि कृत रामायण, महाभारत, बौद्ध रामकथा तथा जैन रामकथा के पांच अध्याओं में समाहित है। द्वितीय भाग ’रामकथा की उत्पत्ति- दशरथ जातक की समस्या, रामकथा का मूलस्रोत एवं प्रचचित वाल्मीकिकृत रामायण के कुछ मुख्य प्रक्षेप तथा रामकथा का प्रारम्भिक विकास आदि शीर्षकों के अन्तर्गत जाँचा-परखा गया है। तृतीय भाग का मुख्य विषय- अर्वाचीन रामकथा का सिंहावलोकन’ है, जिसे विश्लेषण की दृष्टि से ’संस्कृत धार्मिक साहित्य में रामकथा, संस्कृत ललित साहित्य में रामकथा, आधुनिक भारतीय भाषाओं में रामकथा तथा विदेशों में रामकथा शीर्षकों में विभाजित किया गया है। चतुर्थ अध्याय का मुख्य विषय- ’रामकथा का विकास है- जो रामायण के सात काण्डों- बालकाण्ड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, युद्ध काण्ड, उत्तरकाण्ड- आदि से सम्बद्ध विशद सामग्री के अध्ययन-विश्लेषण पर आधारित है। उपसंहार के अन्तर्गत रामकथा की व्यापकता, विभिन्न रामकथाओं की मौलिक एकता एवं अवतारवाद आदि का विवेचन करते हुए इस शोध कार्य की उपलब्धियों को विन्यस्त किया गया है।

डॉ. बुल्के के मतानुसार वैदिक साहित्य में यत्र-तत्र रामायण के पात्रों की चर्चा अवश्य है, परन्तु रामकथा से उनका संबंध कितना है, इसे स्थापित करना कठिन है। ऋग्वेद में दशरथ का नाम दानस्तुति में अन्य राजाओं का उल्लेख करते हुए केवल एक बार आया है। डॉ. दिनेशचन्द्र सेन के मतानुसार दशरथ मध्येशिया की मितन्नि नामक आर्य जाति के राजाओं में एक थे, जिनका शासनकाल 1800 ई. पूर्व के लगभग माना जाता है। इसी प्रकार वैदिक साहित्य में कई राम हैं। तैत्तरीय आरण्यक में राम शब्द का प्रयोग ’पुत्रा’ के अर्थ में किया गया है। प्रवग्र्य (सोमयज्ञ के पूर्व की एक विधि) का अनुष्ठान करने वाले नियमों का निदेश करते हुए कहा गया है- ’’वह एक वर्ष तक मांस-भक्षण न करे, स्त्री-गमन न करे, मिट्टी के बर्तन में पानी न पिये, उसका पुत्रा उच्छिष्ट न पिये आदि।’’ ऋग्वेद में राम का उल्लेख एक बार राजा के रूप में हुआ है। जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण में राम का उल्लेख दो स्थलों पर शिक्षक के रूप में है। इसी प्रकार सीता वहां कृषि की अधिष्ठात्री देवी हैं। तैत्तरीय ब्राह्मण में सीता, सावित्री सूर्य की पुत्री के रूप में उल्लिखित हैं, कृष्णाजुर्वेद के तैत्तरीय ब्राह्मण में ब्रह्मा की दो पुत्रियाँ हैं- सीता और श्रद्धा।

डॉ. बुल्के इस संबंध में अपना मत देते हुए लिखते हैं- वैदिक रचनाओं में रामायण के एकाध पात्रों के नाम अवश्य मिलते हैं, लेकिन न तो इसके परस्पर संबंध की कोई सूचना दी गयी है न इसके विषय में रामायण की कथावस्तु में किंचित भी निर्देश किया गया है। ग्ग्ग् अतः वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा रामकथा संबंधी गाथाएँ प्रसिद्ध हो चुकी थीं, इसका निर्देश समस्त विस्तृत वैदिक साहित्य में कहीं भी नहीं पाया जाता। ग्ग्ग् इससे इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये नाम प्राचीन काल में प्रचलित थे।’’-24

डॉ. वेबर एवं डॉ. दिनेशचन्द्र सेन का मत है कि वाल्मीकि ने पहले-पहल दशरथ, रावण तथा हनुमान, इन तीन स्वतंत्र वृत्तांतों को लेकर रामायण की रचना की। डॉ. याकोबी के मतानुसार रामायण की कथावस्तु के दो स्पष्ट भाग हैं- अयोध्या से सम्बद्ध, जो ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित है तथा दूसरा भाग सीताहरण और रावण वध से सम्बद्ध है जो मूलतः वैदिक साहित्य के पणियों द्वारा गायों के अपहरण एवं वृत्रासुर-वध का विकसित रूप है। ये विद्वान् कथा के प्रथम अर्थात् अयोध्या तक की कथा का आधार ’दशरथ-जातक’ को मानते हैं। डॉ. बुल्के इन मतों को प्रमाणसिद्ध नहीं मानते। ’दशरथ-जातक’ को वे वृत्तांत ब्राह्मण’ की रामकथा का विकृत रूप मानते हैं। इसमें सीता दशरथ की औरस पुत्री तथा राम-लक्ष्मण की सहोदरा बहन है। फिर यह बहुत बाद की रचना है। वे इन मतों की समीक्षा इन शब्दों में करते हैं- ’’रामायण की अंतरंग समीक्षा करने पर बहुत से विद्वान इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि अध्योध्याकांड की घटनाएँ अत्यंत स्वाभाविक हैं तथा लंका की घटनाएँ अलौकिक और काल्पनिक प्रतीत होती हैं। वास्तव में रामकथा के इन दो भागों में अन्तर अवश्य पाया जाता है, लेकिन इसे समझने के लिए रामकथा के भिन्न आधार मानने की आवश्यकता नहीं है। रामायण के इस द्वितीय भाग का प्रधान विषय है- सीताहरण और उसके कारण युद्ध। अयोध्या से राम के निर्वासन के समान यह भी अत्यंत साधारण घटना प्रतीत होती है, अतः कथावस्तु के दृष्टिकोण से दो भागों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है।’’-112

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Tuesday, September 6, 2011

Pant ji ,YAAD AATAA HAI GUJARAA JAMAANAA 55

याद आता है गुजरा जमाना 55

मदनमोहन तरुण

'पंतजी संस्कृत नहीं जानते'

डॉ. बुल्के अपनी मान्यताओं एवं सिद्धान्तों के प्रति बहुत खरे थे। वे महाकवि तुलसीदास के असाधारण अध्येता एवं प्रशंसक थे, परन्तु समय-समय पर उनका कबीर जाग्रत हो उठता था। उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष से सम्बद्ध एक घटना मैं कभी भुला नहीं सकता।

कलकत्ता से मेरे एक प्रकाशक मित्र मुझसे मिलने आए। उन्होंने संस्कृत में एक इतिहास-पुस्तक का प्रकाशन किया था। उस पुस्तक के प्रच्छद पर बड़े-बड़े विद्वानों की प्रशंसात्मक टिप्पणियां जड़ी थीं, जिनमें एक सम्मति महाकवि सुमित्रानन्दन पंत जी की भी थी। मेरे मित्र ने मुझसे अनुरोध किया कि मैं उन्हें डाक्टर बुल्के से अभी मिलवाऊँ। वे खास कर उन्हें यह पुस्तक भेंट में देने आये हैं। उन्हें आज ही बनारस लौट जाना है। उस समय रात के आठ बज रहे थे। जाड़े की रात थी और थोड़ी-थोड़ी वर्षा भी हो रही थी। उन दिनों डॉ. बुल्के अपने सुप्रसिद्ध 'अंग्रेजी-हिन्दी शब्दकोश' को पूरा करने में लगे थे। ऐसी स्थिति में मैं अपने मित्र का अनुरोध पूरा करने में काफी असमंजस का अनुभव कर रहा था। फिर भी उनके अतिशय आग्रह करने पर मैं उनके साथ चलने को तैयार हो गया, किन्तु मैंने उन्हें कुछ हिदायतें भी दीं-

(क) डॉ. बुल्के का अभिवादन अंग्रेजी में न करें।

(ख) वे तनिक ऊँचा सुनते हैं, अतः कुछ जोर से बोलें।

(ग) आवश्यकता से अधिक न बोलें।

जब हम लोग मनरेसा हाउस पहुँचे तो उस समय रात के नौ बज रहे थे। चारों ओर अंधेरा और सन्नाटा था। रात में झाड़ियों से उलझते-पुलझते हम उनके पुस्तकालय कक्ष के द्वार के पास पहुँचे। दरवाजा भीतर से बन्द था। उसके शीशे से भीतर की रोशनी छन-छन कर बाहर आ रही थी और उससे भीतर का दृश्य भी साफ-साफ दिखाई दे रहा था।

एक विशाल टेबुल पर ढेरों पुस्तकें पड़ी थीं और पास ही कुर्सी पर गहन-गंभीर मुद्रा में बैठे डाक्टर बुल्के पुस्तकों के पृष्ठ उलट कर कुछ नोट करते, फिर रुक कर कुछ सोचते और पुनः कुछ लिखने में दत्तचित्त थे। पूरे वातावरण में तपस्या की तन्मयता थी। ऐसे में दरवाजे पर दस्तक क्या तनिक आवाज पैदा करना भी अनुचित था। मैंने अपने मित्र को वहाँ से लौट चलने की सलाह दी। परन्तु वे नहीं रुके। उन्हें अपना गन्तव्य प्राप्त हो चुका था। उन्होंने दरवाजे पर जाकर दस्तक दी। बुल्के साहब ने देखा भी नहीं। दूसरी दस्तक तनिक जोर से। परन्तु भीतर बुल्के साहब शांतचित्त बैठे रहे। कार्यरत। पुनः दस्तक। अब तनिक खीझते हुए उठकर उन्होंने दरवाजा खोला। मित्र के अभिवादन का प्रत्युत्तर देते हुए उन्होंने मुझे भी देखा। मेरे हाथ जुड़ गये। बोले- ’अच्छा, आप, आइए-आइए।’ मैंने असमय में कष्ट देने के लिए उनसे क्षमा-प्रार्थना की। परन्तु मेरे मित्र को धैर्य कहाँ। उन्होंने पुस्तक सम्मानपूर्वक उन्हें देते हुए बताया कि विद्वानों ने उसकी कितनी प्रशंसा की है, साथ ही यह भी अनुरोध कर डाला कि वे इस पुस्तक को अपने विश्वविद्यालय में सन्दर्भ ग्रंथ के रूप में रखवाने की कृपा करें। इस बीच डाक्टर बुल्के पुस्तक के पृष्ठ उलटते रहे और यत्र-तत्र कुछ पढ़ते भी रहे। उन्होंने इस बात के प्रति प्रसन्नता व्यक्त की कि पुस्तक संस्कृत में होने के बावजूद मुद्रण-दोष से सर्वथा मुक्त है। इस प्रशंसा से मेरे मित्रा का उत्साह द्विगुणित हो गया और उन्होंने एक रहस्य खोलते हुए कहा कि पुस्तक में ’रत्न’ शब्द का प्रयोग द्विअर्थक है। एक ओर जहाँ वह भारत की अन्य महान विभूतियों के अर्थ में प्रयुक्त है वहीं नेहरू जी के पारिवारिक त्याग को भी परिलक्षित करता है। पुस्तक पंडित जी को समर्पित है।’ इन शब्दों के साथ ही पासा पलट गया। डॉ. बुल्के के हाथ जो पुस्तक के पृष्ठों से होकर गुजर रहे थे, वे रुक गये। पुस्तक उन्होंने प्रकाशक महोदय को लौटाते हुए असाधारण गंभीरता से कहा- ’मैं छात्रों को इस देश का सही इतिहास पढ़ाने के पक्ष में हूं- किसी की कुल-गाथा नहीं।’ फिर तनिक रुक कर उन्होंने मित्र से कहा- ’मैं आपको आश्वस्त करता हूं कि जब तक मैं यहां रहूँगा तब तक इस पुस्तक को रांची विश्वविद्यालय में प्रवेश करने नहीं दूँगा।’ इन शब्दों के साथ ही उन्होंने हाथ जोड़ते हुए पूरी गरिमा से कहा- ’नमस्कार’ और अपने कार्य में जुट गये।

ये दोनों प्रसंग डॉ. बुल्के की जीवन-दृष्टि को समझने में सहायक हैं। वे स्वयम् फ्रेंच, जर्मन, अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत आदि भाषाओं के ज्ञाता एवं अध्येता थे, परन्तु वे मानते थे कि जो अपने स्रोत एवं अपनी भाषा के प्रति निष्ठा नहीं रखता, वह न तो स्वयम् को समझ सकता है, न दूसरों को। अपनी भाषा फ्लेमिश के प्रति उनकी श्रद्धा अगाध थी एवं अपने छात्र जीवन में फ्रेंच के बढ़ते प्रभाव एवं फ्लेमिश की उपेक्षा के विरुद्ध उन्होंने आन्दोलन आयोजित किए थे। वे अपनी भाषा की उपेक्षा की व्यथा से परिचित थे, अतः भारतीयों को अनावश्यक रूप से अंग्रेजी का प्रयोग करते देखकर उन्हें व्यथा होती थी।

वे शोध एवं इतिहास को किसी विषय के स्रोत तक पहुंचने का महत्वपूर्ण साधन मानते थे, अतः इस क्षेत्र में लाग-लपेट, आग्रह-दुराग्रह एवं हल्केपन से काम करने वालों के प्रति वे करीब-करीब निष्ठुर थे। मुझे याद है उपर्युक्त पुस्तक पर कविवर सुमित्रानन्दन पंत जी की टिप्पणी- ’आशा है यह पुस्तक सर्वजन सुलभ होगी’- पढ़कर उन्होंने तुरत अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा था- ’पंत जी मेरे अच्छे मित्र हैं, परन्तु जहाँ तक मैं जानता हूं उन्हें इतनी संस्कृत नहीं आती कि वे किसी पुस्तक पर ऐसी टिप्पणी दें। फिर, भारत में ऐसे लोग हैं ही कितने जो संस्कृत ठीक से समझते हों। ऐसी स्थिति में ’सर्वजन सुलभ’ शब्द का प्रयोग अनुचित है।’

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Monday, September 5, 2011

Angreji Nahi ,Hindi boliye : YAAD ATAA HAI GUJARAA JAMAANAA 54

याद आता है गुजरा जमाना 54

मदनमोहन तरुण

'अँग्रेजी नहीं, हिन्दी बोलिए'

’रामकथाः उत्पत्ति एवं विकास’ जैसे असाधारण ग्रंथ के प्रणेता एवं हिन्दी की सेवा के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित विद्वान डॉ. कामिल बुल्के के दर्शन की प्रबल इच्छा तो बहुत पहले से ही थी, परन्तु संयोग नहीं बन पा रहा था।

एक दिन मैं राधाकृष्ण जी (वे राँची में लाल बाबू के नाम से विख्यात थे) के पास बैठा था। निराला जयंती के वृहद् आयोजन पर बातचीत चल रही थी, तभी उसी प्रसंग में डॉ. बुल्के की चर्चा चलते ही उन्होंने पूछ दिया- ’बुल्के जी से तो मिल ही चुके होंगे!’ बस उनके इस प्रश्न के साथ ही बहुत पहले से मन में सँजोयी हुई इच्छाएँ जाग उठी और मैंने उनसे शीघ्रातिशीघ्र मिलने का निर्णय ले लिया।

उन दिनों वे सेन्ट जेवियर्स कॉलेज के हिन्दी तथा संस्कृत विभागों के अध्यक्ष थे तथा आवास स्थान पर उनसे मिलने का समय निश्चित था। राधाकृष्ण जी से उनके आवास स्थान की पूरी जानकारी लेकर एक दिन प्रातःकाल मैं दर्शनार्थ उनके मनरेसा हाउस में पहुँच गया। वे बाहर ही टहल रहे थे। उन्हें देखते ही मेरे पांवों में मानो पूर्ण विराम लग गया और मैं ठिठक कर खड़ा उनकी ओर देखता रह गया- सीधा लम्बा, स्वस्थ संकल्पित शरीर जिस पर पादरियों का सफेद लम्बा चोंगा, अपेक्षया लम्बे से चेहरे पर सीधी तनी नाक, उसके दोनों ओर झील सी पारदर्शी आंखें, पतले होंठ, प्रशस्त ललाट, लाली लिए चिट्टा गोरा रंग जो अपनी समग्रता में संकल्प, एकाग्रता एवं उदारता को आयत्त करता हुआ एक विलक्षण प्रभाव छोड़ रहा था। मुझे पास आता देखकर वे भी आत्मीयतापूर्वक मुस्कुराए। मैं अभिभूत हो उठा और हाथ जोड़ते हुए मैंने अशेष श्रद्धा के साथ उनका अभिवादन करते हुए कहा- ’गुडमार्निंग फादर’! किन्तु यह क्या, इन शब्दों को सुनते ही उनके चेहरे से आत्मीयता की सारी दीप्ति हठात गायब हो गयी। उनका चेहरा तमतमा गया, लगा किसी ने उनका अपमान कर दिया। वे बिना मुझसे बातें किए ही सीधे पीछे मुड़ कर अपने कक्ष की ओर चले गये। मैं उनकी प्रतीक्षा करता रहा, परन्तु वे लौट कर नहीं आए। मैं स्तम्भित, अपमानित-सा खड़ा रह गया। बहुत प्रयास करने पर भी मैं समझ नहीं पाया कि उनके रुख में आकस्मिक परिवर्तन का आखिर कारण क्या है। मैं लौट आया और मन ही मन यह निर्णय ले लिया कि अब इस जन्म में मैं इस आदमी से कभी भी नहीं मिलूँगा।

मैंने राधाकृष्ण जी से भी इसकी चर्चा नहीं की। आखिर इस प्रसंग में ऐसा था ही क्या जिसकी चर्चा की जा सकती थी, किन्तु मैं भीतर से बहुत व्यथित था। उनकी उदारता और महानता के बारे में जो कुछ भी सुना था सब कुछ मानो अपने ही पर मुँह बिरा रहा था। उँह! इतना गरूर!

कई दिनों बाद राधाकृष्ण जी ने बातों-ही-बातों में पूछ दिया- ’बुल्के साहब से मिले कि नहीं!’ बस मेरे भीतर का दबा गुबार फट पड़ा। सारा प्रसंग सुनकर राधाकृष्ण जी ने पूछा- ’कहीं आपने उनका अभिवादन अंग्रेजी में तो नहीं किया था!’ मैंने कहा- हाँ किया तो था!’ राधाकृष्ण जी ने मुस्कुराते हुए कहा- ’यहीं भूल हो गयी आपसे। मैं शुरू में आपको यह बतलाना भूल गया था। बुल्के साहब आचार-व्यवहार में अंग्रेजी भाषा के कट्टर विरोधी हैं। वे इसे अपना व्यक्तिगत अपमान समझते हैं।’ अब राघाकृष्ण जी थोड़ी देर के लिए रूके और बीड़ी सुलगा कर उसके लम्बे केश का आनन्द लेने के बाद उन्होंने कहा- ’बुल्के साहब का जन्म बेल्जियम के पश्चिमी फ्लैण्डर्स प्रांत के रम्सकपैले गांव में हुआ था। उन दिनों बेल्जियम में फ्रेंच भाषा का वर्चस्व होने के कारण उनकी अपनी भाषा फ्लेमिश उपेक्षित थी। लोग ऐसे लोगों को नीची निगाह से देखते थे जो फ्रेंच की जगह फ्लेमिश बोलते थे। डॉ. बुल्के के भीतर अपनी भाषा की उपेक्षा की यह व्यथा बहुत ही गहरी है। यही कारण है कि जब भी कोई भारतीय अपनी भाषा की जगह अंग्रेजी में उनका अभिवादन करता है तो उनकी व्यथा और भी गहरा जाती है।’

अब तो जैसे मेरी आँखें खुल गयीं। अभिवादन के पश्चात् मेरे चेहरे पर क्षण भर को टिकी उनकी आँखें, उनका विक्षोभ और व्यथा से गहराता चेहरा, फिर उनका उलटे पाँव लौट जाना, सब कुछ याद आ गया। और मेरा अभिभूत मन उनके प्रति श्रद्धा से भर उठा।

राधाकृष्ण जी आदत के मुताबिक दो-तीन कश लगाकर शेष बीड़ी अब तक फेंक चुके थे। अधिक ताजे और संतुष्ट लग रहे थे। उन्होंने कहा- ’मैं खुद अब आपको उनके पास ले चलूँगा।’

दूसरे दिन राधाकृष्ण जी के साथ उनसे मिलने पहुँचा तो मैंने कोई भूल नहीं की। मैंने हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए उनका अभिवादन किया- इसके प्रत्युत्तर में उन्होंने जिस प्रकार ’नमस्कार’ शब्द का उच्चारण किया वह अपने-आप में मेरे लिए एक अभूतपूर्व अनुभव था। उसके पश्चात् बुल्के साहब से मुझे बहुत निकटता प्राप्त हुई। मुझ पर उनका अशेष स्नेह था। सार्थक विद्या के प्रति निरन्तर जिज्ञासा और विषय की तह तक पहुँच जाने का अथक प्रयास उनकी विशेषता थी। उनके विशाल व्यक्तिगत पुस्तकालय की पुस्तकें अपने अध्येता के स्पर्श के स्पन्दन से पूर्णतः परिचित थीं।

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Saturday, September 3, 2011

Yahaan Eik Nayee Sanskriti .Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 53

याद आता है गुजरा जमाना 53

मदनमोहन तरुण

यहॉ एक नई संस्कृति जन्म ले रही है

एक दिन जब मैं राधाकृष्ण जी के यहॉं पहुँचा तो उन्होंने बड़े उत्साह से मेरा स्वागत करते हुए कहा – ‘ आइए , आइए ! आज मैं आपकी मुलाकात बौध्द साहित्य और संस्कृत के महान विद्वान एवं हिन्दी के विख्यात कवि नागार्जुन जी से कराता हूँ। मैं भी चहक उठा। उनकी 'अकाल' कविता खास तौर से याद आगयी।मिलने को मन बेचैन हो उठा। मैं पास ही कुर्सी पर बैठ गया। वहीं पर खिचड़ी बालों वाले एक बुजुर्ग सज्जन एक पुराने से कम्बल में खुद को लपेटे करीब –करीब गठरी की तरह लुढ़के हुए थे। सोचा राधाकृष्ण जी के गॉव के कोई रिश्तेदार होंगे। मैंने ध्यान नहीं दिया । मैं तो नागार्जुन जी की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी उस गठरीनुमा सज्जन ने हल्के से आवाज दी – ‘कैसे हो ?’ ‘मैंने वैसे ही जवाब दे दिया ‘ठीक हूँ’।फिर इंसानियत के नाते पूछ दिया – ‘इलाज के लिए आए हैं क्या ?’ वे कुछ बोलते इसके पहले ही राधाकृष्ण जी भीतर से बाहर आगये। पूछा – ‘मिले नहीं ?’ मैने कहा – ‘अभी आए कहॉं हैं?’ वे बोले – ‘ओहोह ! आप भी धोखा खा ही गये ?’ उसके बाद तो जैसे जादू का खेल शुरू होगया और कम्बल के गट्ठर से एक काले ओवरकोट वाले सज्जन निकल आए।मेरी ओर देख कर एक शरारती बच्चे की तरह हॅसे ।आगे के दॉत बिकलकुल गायब ! मैं भी उछल पड़ा – कौए ने खुजलाई पॉखें बहुत दिनों के बाद ! फिर कभी लगा ही नहीं कि इतने बड़े लेखक से मिल रहा हूँ। और पहली बार मिल रहा हूँ। वे जर्मनी से लौटे थे। उन्हीं दिनों मुक्तिबोध जी का निधन हुआ था । वे आहत थे। उन्होंने उनपर एक कविता सुनाई थी, जिसकी बस एक ही पंक्ति याद है – ‘आओ मुक्तिबोध बीड़ी पीएँ।’ फिर मैं उन्हें बाबा कह कर बुलाने लागा । वे पूरे हिन्दी साहित्य के बाबा थे। वे रॉची में करीब सप्ताह भर रुके और मेरी उनसे देर – देर तक बातें होती रहीं।डॉ रणधीर सिनहा के बड़े भाई हटिया में रहते थे। उन्होंने अभी – अभी शादी की थी। बाबा को उन्होंने वधू को आशीर्वाद देने के लिए बुलाया। हटिया पहुँचकर आशीर्वादादि सम्पन्न कर जब वे बाहर आए और हटिया पर एक दृष्टि डाली तो चहक पड़े। ‘यहॉ एक नयी संस्कृति पनप रही है।पूरा विश्व एक परिवार के रूप में ढल रहा है।यह रूस और भारत के मिलन का असाधारण बिन्दु है।उभरते लेखकों के लिए तो यह जीवन की ऐसी प्रयोगशाला है , जहॉ दो महान संस्कृतियों के रसायन मिश्रण और उसके परिणाम को खुली ऑखों से देखा जा सकता है, ’ फिर तनिक रुक कर उत्तेजना पूर्वक बोले ‘जो साला, रॉंची में रहते हुए भी यहॉ सप्ताह में कम –से – कम दो बार नहीं आता , वह लेखक नहीं है ।’

एक दिन मैं उन्हें शहर घुमाने ले गया।उन्हें दमे का दौरा था।सोचा रिक्शे से ही इन्हें मेन रोड घुमा दूँ , परन्तु फिराया लाल के विक्रय केन्द्र के पास उन्होंने रिक्सा छोड़ दिया और बोले घूमने का मजा पैदल – पैदल ही है।

वे चलते – चलते किसी विषय पर खूब जोर – जोर से बीच सड़क पर खड़े होकर बोलने लगते ,जिससे आगे – पीछे से गाड़ियॉ रुक जातीं ,परन्तु क्षण भर में ही लोग सदाशयता से अपनी गाड़ियॉ टेढ़ी – मेढ़ी कर आगे निकल जाते।तब उस सड़क पर ट्रैफिक की उतनी भीड़ भी नहीं होती थी और लोगों में एक – दूसरे के प्रति सहिष्णुता थी।उस दिन की यात्रा बड़ी नाटकीय रही।रास्ते में युवा पीढ़ी के कई लेखक बाबा से मिले ।सब को उन्होंने उसी आत्मीयता से अपनाया।मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि हिन्दी मे शायद ही कोई लेखक हो जो नयी पीढ़ी के लेखकों के प्रति इतना सहज हो।वे आत्मा की ऊर्जा से इतने सम्पन्न थे कि रोग , उम्र और शरीर सब की सत्ता नकार कर जीते थे।

जब बाबा लौटने लगे तो लगा घर का कोई सदस्य जा रहा हो। मन भारी - भारी - सा हो गया।उसके बाद उनसे मेरी मुलाकात दो – तीन बार और हुई।हर मुलाकात अनूठी ! अविस्मरणीय !

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Thursday, September 1, 2011

Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 52

याद आता है गुजरा जमाना 52

मदनमोहन तरुण

राँची के साहित्यकार (1) 52

धुआँपाखी

उन दिनों राँची में हिन्दी के कई वरिष्ठ साहित्यकार रहते थे। मेरे मन में उनसे मिलने की प्रबल इच्छा थी।

प्रेमचन्द की परम्परा के वरिष्ठ लेखक राधाकृष्ण जी रॉची में ही निवास करते थे।एकदिन मैं उनसे मिलने के लिए अचानक ही ,सबेरे - सबेरे पहुँच गया। उ्होंने बडी॰ आत्मीयता के साथ मेरा स्वागत किया।

वे समग्रतः एक कुशल किस्सागो थे।उनके पास रोचक संस्मरणों का आगार था। कुछ ही दिनों में मेरी उनसे अगाध आत्मीयता होगयी और मैं उनका नियमित श्रोता बन गया। प्रातःकाल अपने होस्टल में व्यायाम करने के पश्चात मै धारोष्ण दूध पीने पास ही के मारवाड़ी गोशाला में जाता था।वहॉ से दूध पीकर ग्लास लिए ही मैं लाल बाबू ( रॉची में राधाकृष्ण जी लाल बाबू के नाम से विख्यात थे ) के घर पहुँच जाता था। वे मानो मेरी प्रतीक्षा ही करते रहते। तुरत भीतर से लुंगी और गंजी पहने तथा हाथ में बीड़ी का बंडल लिए बैठक में आजाते और शुरू होती उनकी द्रौपदी के चीर सी लम्बी वार्ता।उनकी स्मृतियॉ समय और दूरी को छलॉंगती – फलॉंगती न जाने कहॉं – कहॉं की यात्रा पर निकल पड़ती और उनकी बीड़ी का धुऑ कभी गाढ़ा , कभी हल्का होता उन स्मृतियों का पीछा करता रहता। राधाकृष्ण जी की अमर कहानी ‘वरदान का फेर’ मैं रॉची आने के पहले ही पढ़ चुका था। उस समय मेरे मन में बार – बार यह प्रश्न उठता ‘ कैसा होगा इस कहानी का लेखक ? सो , वही राधाकृष्ण जी बनाम हिन्दी के स्वनामधन्य ‘घोस, बोस ,बनर्जी, चटर्जी' मेरे सामने थे।सीधे , सरल ,सच्चे।जब वे बातें करते तो जैसे वे अपनी दैहिक सत्ता से बाहर चले जाते और कहानियों का अनवरत प्रवाह बन जाते।उनकी कहानियों का खजाना उससे कहीं ज्यादा था जितना उन्होंने लिखा।

मेरी भाषा सुनकर राधाकृष्ण जी को आश्चर्य होता और वे कहते ‘आपकी भाषा में तो बिहारीपन है ही नहीं, लेकिन कभी पकड़ लूँगा।’ इसी पर उन्होंने एक संस्मरण सुनाया –‘ एक बार मैं राजेन्द्र बाबू का भाषण सुन रहा था।उनकी भाषा में बिहारीपन का स्पर्श तक नहीं था। मैंने सोचा ऐसा हो कैसे सकता है कि एक बिहारी बोले और उसकी भाषा में बिहारीपन का स्पर्श न हो।मैं सोच ही रहा था कि राजेन्द्र बाबू बोले …और ठोप – ठोप पानी चू रहा था।’ कह कर लाल बाबू ठठा कर हॅस पड़े और अपनी इस सफलता को बीड़ी का एक मधुर कश देकर पुरस्कृत किया।

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Monday, August 22, 2011

Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 51

याद आता है गुजरा जमाना 51

मदनमोहन तरुण

मेरा काँलेज

राँची काँलेज एक विशाल काँलेज था जहाँ हजारों छात्र विभिन्न विषयों का अध्ययन करते थे। यह जहानाबाद के अति सीमित संसार से सर्वथा भिन्न संसार था।यह दुनिया चारों ओर से खुली हुई थी। छात्रों के अलावा यहाँ करीब बीस प्रतिशत छात्राएँ भी अध्ययन करती थीं, जो केवल लड॰किओं के बीच ही सिमट कर नहीं रहती थीं। उनका सबसे विचारों का आदान- प्रदान होता था।कुछ छात्र संघ के जिम्मेदार पदों पर भी थीं।

यहाँ एक नयी दुनिया अपने आनेवाले कल की खुल कर तैयारी कर रही थी। इसे बनते हुए देखना और उसमें अपनी भागीदारी तय करना एक रोमांचक अनुभव था।

काँलेज के हर विषय में कई युवक और बुजुर्ग अध्यापक थे जो अपने विषय में निष्णात थे।उनमें कई अपने क्षेत्र के सुप्रसिद्ध और सुप्रतिष्ठत व्यक्ति थे। कई अपने विचार , व्यवहार और आचरण की विचित्रताओं के लिए छात्रों के बीच विख्यात थे।कई की पढा॰ते समय दीवानगी देखने लायक थी।

हिन्दी में कविता लिखने के कारण बी. ए. में मैंने हिन्दी - साहित्य को अपने अध्ययन के मुख्य विषय( आनर्स) के रूप में चुना। इसके अन्तर्गत तीन सामान्य पेपर्स के साथ इस विषय के अन्य छात्रों की तुलना में तीन अतिरिक्त पेपर्स का अध्ययन करना पड॰ता था। मेरे मित्रों को जब यह मालूम हुआ कि मैं हिन्दी - साहित्य को अपने अध्ययन का विषय बनाने जा रहा हूँ तो उन्हें बहुत निराशा हई। वे मेरे पास आए और मुझे हर प्रकार से समझाने की चेष्टा की कि हिन्दी में कविता लिखना अलग बात है और अध्ययन - विषय का चयन करना अलग बात है। उन्होंने कहा कि पढा॰ई का उद्देश्य है सम्मानपूर्वक रोजी - रोटी कमाना। हिन्दी इसके लिए सक्षम नहीं है। आज अँग्रेजी का बोलवाला है और भविष्य में इस भाषा की माँग बढ॰ती ही जाएगी।इसके विपरीत हिन्दी का कोई भविष्य नहीं है।' उनके विचारों का सम्मान करते हुए भी मैंने अपना निर्णय नहीं बदला। मेरा विचार यह था कि यदि किसी भाषा में लेखनकार्य करना हो, उस पर पूरा अधिकार और उसकी पूरी तैयारी बहुत आवश्यक है।

यह वह समय था जब लोग गॉधी, नेहरू के साथ – साथ प्रेमचन्द , मैथिलीशरण गुप्त , निराला और दिनकर के नाम भी याद रखते थे।अपने शहर के लेखकों एवं विद्वानों की चर्चा से उनकी ऑखों में चमक आजाती थी।साहित्यिक , सांस्कृतिक समारोहों एवं कवि सम्मेलनों में लोगों की अच्छी भीड़ उमड़ आती थी और जनजीवन उससे नयी ताजगी और अपनी जाग्रत परम्पराओं की ऊर्जा लेकर आगे चल पड़ता था।

नकेन के प्रवर्तकों में एक श्री केसरी कुमार जी रॉंची काँलेज के व्याख्याता थे । वे हिन्दी कम्पोजीशन पढ़ाते थे। उन दिनों इन कक्षाओं में तीन सौ के करीब छात्र हुआ करते थे। उन पर मात्र विद्वत्ता के बल पर नियंत्रण रखना सरल न था।केसरी कुमार जी को यह कार्य जानबूझ कर दिया गया था क्योंकि वे विद्वान के साथ दवंग भी थे। वे उन व्याख्याताओं में भी नहीं थे कि 'सुनो या न सुनो मैं तो पढाऊँगा' के दर्शन में विश्वास रखते थे। केसरी कुमार जी के क्लास की एक अलिखित मर्यादा थी।वे पूरी तल्लीनता से पढ़ाते और यदि किसी ने बीच में जरा भी चूँ - चपड़ की तो वे मंच से ही चिल्ला पड़ते और फिर बड़ी तेजी से उस छात्र की बेंच के पास आकर बड़े जोरों से ताली बजा कर भाषण के मंच पर लौट आते और उसी प्रवाह और तल्लीनता में बोलने लगते जहॉ पर वे रुके थे। उस समय लगता ही नहीं था कि अभी कुछ हुआ था।इस प्रकार ताली बजाने की जरूरत उन्हें सत्र में एक – दो बार से ज्यादा नहीं होती थी। वे एम. ए . में श्यामसुन्दर दास का ‘साहित्यालोचन’ पढ़ाते थे।’साहित्यालोचन’ की उनकी प्रति सामान्य प्रतियों से दुगनी मोटी हुआ करती। इस रहस्य को जानने का अवसर मुझे उनके आवासस्थान पर मिला।पूरी पुस्तक की जिल्दबन्दी उनकी टिप्पणियों तथा सम्बध्द सामग्री के साथ की गयी थी।केसरी कुमार जी के सेवानिवृत्त होने का महीना था।राधाकृष्ण जी ने निराला जयंती का आयोजन किया था और नगर की ओर से केसरी कुमार जी की विदाई का समारोह भी उसी के साथ जोड़ दिया गया था।इस समारोह में पटना से नलिनविलोचन शर्मा जी एवं बनारस से त्रिलोचन शास्त्री जी आमंत्रित थे।त्रिलोचन जी पंडित भवभूति मिश्र जी के यहॉं रुके थे।शास्त्री जी के पास एक ही कुर्ता - पाजामा था जिसे वे रात में अँगोछी पहन कर धो लिया करते और सवेरे लोटे में आग डाल कर स्त्री कर लेते थे।

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