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Tuesday, January 31, 2012

Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 92


जागृति : याद आता है गुजरा जमाना 92

मदनमोहन तरुण

इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के

अपने समय में बनी जिन फिल्मों को मैं कभी भुला नहीं पाया , उन आसाधारण फिल्मों में 'जागृति' एक है। स्कूल के प्रधानाचार्य  के रूप में अभिभट्टाचार्य का अभिनय इस फिल्म की उपलब्धियों में है। वे प्रधानाचार्य के रूप में अपने छात्रों में नूतन मूल्य - चेतना जाग्रत कर उन्हें निष्ठावान नागरिक के रूप में ढालना चाहते हैं। स्कूल के अधिकारी एवं शिक्षकगण उनके इन प्रयोगों से सहमत नहीं हैं ,इस कारण उनकी आलोचना होती है ,परन्तु वे अपने प्रयोगों के प्रति अटल रहते हैं।
इन्हीं दिनों एक धनाढ्य परिवार के छात्र अजय का विद्यालय में नामांकन होता है। अजय एक नियम -भंजक है। वह हर रोज नयी - नयी शरारतें करता है और अपने कुछ शिक्षकों का जीवन दुष्कर बना देता है। स्वयं प्रधानाचार्य भी कभी - कभी उसे सु धारने में स्वयं को असमर्थ अनुभव करते हैं ,किन्तु वे अपनी प्रयोगधर्मिता का मार्ग नहीं छोड॰ते।
इसी बीच अजय की मित्रता शक्ति नाम के एक अपंग सहपाठी से हो जाती है जो अपनी गरीब माँ का एकमात्र बेटा है तथा जो जीवन के उच्च मूल्यों के प्रति समर्पित है। शक्ति भी अपने इस मित्र को सुधारने की बहुत चेष्टा करता है , परन्तु सफल नहीं हो पाता। एकदिन अजय स्कूल से चले जाने का निर्णय लेता है। अजय को रोकने के क्रम में सड॰क पार करते समय एक्सीडेंट में शक्ति की मृत्यु होजाती है। इस अप्रत्यासित घटना से आहत अजय के जीवन में असाधारण परिवर्तन आता है। उसके भीतर की दिशाहीन शक्तियाँ सुसंगठित होकर नया रूप लेलेती हैं। कुछ ही दिनों में वह अध्ययन और खेल दोनों ही में अपना सर्वोपरि स्थान बना लेता है।
आत्यंतिक घटनाक्रमों , भाव -संवेगों के बीच से गुजरती इस फिल्म की सुनियोजित कहानी न तो कहीं शिथिल होती है, न कहीं अकारण स्खलित होती है। अजय के आचरण की आत्यंतिकता, शक्ति के चरित्र की गहन संवेदनशीलता एवं अभिभट्टाचार्य जी की सुनियोजित, किन्तु नयी स्थितियों की स्वीकृति के प्रति खुलापन ,फिल्म को कहीं भी अस्वाभाविक होने नहीं देता और उसका प्रभाव निरन्तर गहन से गहनतर होता जाता है।
सुनियोजित कहानी, सुसिद्ध अभिनय कौशल , स्थान - स्थान पर ऐतिहासिक घटनाक्रमों का कुशल संगुफन , के साथ ही इस फिल्म की एक और असाधारण और कालजयी उपलब्धि है, और वह है ,कवि प्रदीप जी द्वारा लिखे इस फिल्म के अमर गीत , जो कानों से होकर हृदयतल में गूँजने लगते हैं। उन गीतों मे ' आओ बच्चों तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिन्दुस्तान की , इस मिट्टी से तिलक करो यह मिट्टी है बलिदान की', जिसे स्वयं कवि प्रदीप जी ने गाया है, ऐसे ही दूसरे राष्ट्रभक्तिपरक गीत ' दे दी हमें आजादी बिना खडग बिना ढाल, सावरमती के संत तूने कर दिया कमाल', को आशा भोसले जीने गहन भावुकता से प्रस्तुत किया है तथा ' हम लाए हैं तूफान से किश्ती निकाल के , इस देश को रखना मेरे बच्चों सम्हाल के', जैसे महान गीत को मुहम्मद रफी जी का स्वर मिला है। राष्ट्रीय समारोहों के अवसर पर आज भी , करीब 62 साल बाद भी ,ये गाने मन- प्राणों पर वैसा ही गहन प्रभाव उत्पन्न करते हैं।
इस फिल्म का निर्देशन सत्येन बोस जी ने और संगीत निर्देशन हेमंत कुमार जी ने किया था।
यह फिल्म पहली बार 1956 में रिलीज हुई थी, तब मैंआठवीं कक्षा का विद्यार्थी था। इसे मैंने घुमंतू सिनेमा के टेंट में दरी पर बैठकर देखा था। अबतक मैं इस फिल्म का एक भी दृश्य नहीं भूला हूँ।इसके कलाकारों की एक -एक भंगिमा मुझे याद है।
कवि प्रदीप जी ने हिन्दी को कई अमर गीत दिये हैं, परन्तु इस फिल्म का हर गीत तबतक अमर रहेगा ,जबतक हममें राष्ट्राभिमान की अनुभूति बनी हुई है।

इस फिल्म के गानों की ऊष्मा का एक और कारण है। जब यह फिल्म बनी थी , तब हमारी आजादी के केवल आठ - नौ साल ही गुजरे थे। सावरमती के उस अनूठे संत की अद्भुत लडा॰ई हर किसी के भीतर तरोताजा थी।इस फिल्म को ऐसे अनेकों लोगों ने देखा था जिसने गाँधी जी की इस अनूठी लडा॰ई में भाग लिया था।

यह फिल्म हमारी उन क्लैसिक फिल्मों में है जो हमेशा नहीं बनतीं, इस  के फिल्म गाने उन अमर गानों में हैं ,जो हमेशा नहीं लिखे जाते।
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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 91


मधुबाला : याद आता है गुजरा जमाना 91
मदनमोहन तरुण
मधुबाला रूप और यौवन का महोत्सव

सुन्दरता ईश्वर की कला का परम उत्कर्ष है। वह अपनी सृष्टि को निरन्तर विविध रंगों और रूपों से सजाता रहता है। इस विराट - विशाल सृष्टि का कण -कण और क्षण - क्षण अपार सौन्दर्य से परिव्याप्त है जो हमें निरन्तर जीने की प्रेरणा देता है।हरिताभ वृक्षों पर जब खिलखिलाते फूलों की बहार आजाती है,नदी का शांत जल-विस्तार जब प्रभात की किरणों से रंजित होकर उसकी अपार लीलामयता का महोत्सव बन जाता है ,रात्रि का आकाश जब तारों से मंडित होकर अंधकार में भी चमक उठता है,कोई सुन्दर चेहरा जब हमारी दृष्टि से सरकता हुआ निकल जाता है तब उन सम्मोहनपूर्ण पलों में भी विधाता की इस कवित्वमय कला की सराहना किये बिना हम नहीं रह सकते।

सुन्दरता का प्रभाव असाधारण होता है। वह हमारे मन- प्राणों में गुदगुदी पैदा कर देता है।हमारी चेतना पर छाजाता है।हमारी स्मृति को सदा के लिए आवृत कर लेता है। अबतक मैंने जितने सुन्दर चेहरे देखे हैं , जितने सुन्दर दृश्य देखे हैं , वह मेरे भीतर उसी पल के सम्मोहन के साथ अंकित है। सोचकर कभी - कभी चकित होजाता हूँ कि ईश्वर ने हमारे भीतर कितना बडा॰ जीवंत कैनवास दिया है जिसपर जितने भी चित्र बनाओ , वह कभी भरता नहीं। ईश्वर ने हमें जो भी दिया है , भरपूर दिया है।

इन पंक्तियों को लिखते हुए मुझे अपने जमाने की फिल्म अभिनेत्री मधुबाला की याद आरही है।रूपवती मधुबाला सौन्दर्य का जादूई निर्माण थी।उसकी हिरणी - सी चमकती चंचल बडी॰ - बडी॰ आँखें , रसभरे होंठ,चेहरे की प्रफुल्ल ताजगीभरी आभा और समग्र शरीर की लोचभरी पृथुलता में एक असाधारण सम्मोहन था, जिसे भुलापाना असम्भव है।

योंतो 'मुगले आजम' मधुबाला की सुप्रशंसित फिल्मों में से एक है ,परन्तु उसके सौन्दर्य के उत्कर्ष का जो निखार 'बरसात की रात' फिल्म में दिखाई पड॰ता है , वह अन्यत्र कहीं भी नहीं।मुहम्मद रफी की आवाज और भारतभूषण जी द्वारा अभिनीत 'जिन्दगीभर नहीं भूलेगी वो बरसात की रात' गाने की प्रगति के साथ मधुबाला  के कल्लोलपूर्ण  यौवन  - हिल्लोलित सौन्दर्य का जो उत्कर्षपूर्ण चित्रण हुआ है , वह हिन्दी के अबतक के फिल्म -संसार में अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ है। वह एक रूपसी के ब्लैक ऐण्ड ह्वाइट में चित्रित सौन्दर्य का असाधारण जीवंत और जीवंत साक्षात्कार है।  उनपलों की मधुबाला को देखना एक अभूतपूर्व अनुभव है। ‘न भूतो न भविष्यति ।‘उस पल की मधुबाला को मैं अपने आप्यायित क्षणों में आज भी जब जी करता है , अपनी आँखें मूँदकर देख लिया करता हूँ।

आज सुन्दरी अभिनेत्रियों की कमी नहीं , परन्तु वे अपने चेहरे के साथ अपनी नंगी टाँगें इतनी बेरहमी से बार - बार दिखाती हैं कि  कईबार पता नहीं चलता कि उसकी टाँग कहाँ है और उसका चेहरा कहाँ है।

मधुबाला के चेहरे जैसा ही उसका जघन-प्रदेश और पृष्ठ -प्रदेश भी उच्छल प्रभाव डालता था ,एक थ्रिल पैदा करता था, दिल की धड॰कनें बढा॰ देता था ,परन्तु मुझे याद नहीं कि स्नान के दृश्य में भी कभी उसने अपने शरीर का भद्दा प्रदर्शन किया हो। इसी बात पर एक कहानी याद आती है।शायद यशपाल जी की कहानी 'तुमने क्यों कहा था कि मैं सुन्दर हूँ' कि याद आरही है।इस कहानी की याद बहुत झीनी - झीनी -सी है इसलिए इसके चित्रण में कोई त्रुटि रह गयी हो ,तो क्षमा करेंगे।एक युवक को एक सुन्दरी युवती बहुत पसन्द थी । वह छुप - छुप कर जब भी अवसर मिलता उसे निहारा करता था।थी। इसका उस युवती को भी एहसास था।युवक की दृष्टि से सम्मोहित युवती एकदिन उसके पास पहुँच गयी।उसने सोचा युवक ने अबतक केवल मेरा चेहरा देखा है , इसने मेरा पूरा सुन्दर शरीर तो देखा ही नहीं।यह सोचकर युवती ने अपने शरीर से सारे कपडे॰ खोल कर हटा दिये और युवक के सामने नंगी खडी॰ होगयी । अबतक जो युवक उसे सम्मोहनपूर्ण निगाहों से देख रहा था उसे इस तरह अपने सामने नग्न देखकर मर्माहत होगया। उसे उस युवती से इतनी वितृष्णा हो गयी कि वह वहाँ से उठकर चला गया और उसने उस युवती को फिर कभी नहीं देखा।

महान कलाकारों ने स्त्री - पुरुष के नग्न शरीरों का असाधारण और अविस्मरणीय चित्रण किया है। वे हमारी कला की अमूल्य थाती हैं किन्तु इसका तात्पर्य यह नहीं कि हमारी अभिनेत्रियाँ हमारे सामने जब मन मेंआए तब नंगी खडी॰ होजाएँ। ऐसी नग्नता निस्सन्देह हमारी सौन्दर्य - चेतना को आहत करती हैं।

। उसका वह उद्दाम कल्लोलभरा रसमय यौवन , वह खनकभरी हँसी , वे जादूई आँखें इस जमाने की भीड॰ में भी कभी खो नहीं सकती। अबतक समय न जाने कितने दौरों से गुजर गया , लेकिन अपनी पत्नी के साथ देखी फिल्म 'बरसात की रात' की मधुबाला को शायद ही कभी भुला सकूँगा।
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Yaad Ataa Hai Gujaraa Jamaanaa 90


यह रेडियो सिलोन है , याद आता है गुजरा जमाना 90

मदनमोहन तरुण

यह रेडियो सिलोन है

1950 के दशक में रेडियो सिलोन हिन्दी के मधुरतम फिल्मी गानों के प्रसारण की अन्यतम पहचान बन चुका था। लोग सवेरे रेडियो सिलोन आँन कर लेते।सात बजे से सवा सात तक भजन ,सवा सात से साढे॰सात तक किसी एक पुराने गायक के गाये गीत ,साढे॰ सात से आठ बजे तक पुरानी फिल्मों के गीत और आठ बजे से फरमइशी गानो  का कार्यक्रम , जो श्रोताओं की पसन्द पर आधारित होता था। रेडियो सिलोन ने अपने मधुर गानों के प्रसारण से घर - घर को माधुर्य से भर दिया था। बच्चे , बुजुर्ग , जवान सभी उसके दीवाने थै।
रेडियो सिलोन की एक और पहचान थी जिसके प्रति लोगों में आसाधारण दीवानापन था।
प्रत्येक बुधवार को रात्रि आठ बजे से नौ बजे तक लोकप्रियता की कसौटी पर कसे हुए हिन्दी फिल्मी गानों के कार्यक्रम।
 ‘बिनाका गीतमाला’ ने फिल्मी गीतों के प्रसारण के इतिहास में एक ऐसा इतिहास लिखा जिसका अबतक कोई दूसरा उदाहरण नहीं है। कहा जाता है कि इसके श्रोताओं की संख्या करीब नौ से बारह करोड॰ थी और इस प्रसारण ने भारत भर की भाषाओं का भेद मिटा दिया था। इसे करीब पूरे भारत में सुना जाता था। इस कार्यक्रम के महाप्राण थे अमीन सायानी। उनकी जादू भरी आवाज को जो एकबार सुन लेता था , उसे कभी भुला नहीं पाता था। इन पंक्तियों को लिखते हुए मेरे भीतर कहीं वह आवाज अब भी गूँज रही है। उनदिनों अमीन सायानी की आवाज से मोहक कोई और आवाज नहीं थी। वे कोई गायक नहीं थे , राजपुरुष नहीं थे , वे महज एक कार्यक्रम के संचालक थे। उनकी आत्मीयताभरी आवाज मे 'बहनों और भाइयों' का सम्बोधन लोगों को दीवाना कर देता था। अमीन सायानी रेडियो सिलोन की महान उपलब्धि थे। सच तो यह है कि अमीन सायानी और रेडियो सिलोन एक - दूसरे के पर्याय बन चुके थे।
रेडियो सिलोन से प्रसारित होनेवाले गानों ने भारतीय रेडियो के मनोरंजन को खतरे में डाल दिया था।    इसका मुकावला करने के लिए भारतीय रेडियो ने 'विविध भारती' नाम से हिन्दी फिल्मों के गानों का प्रसारण शुरू किया।
'संगीत सरिता', भूले - बिसरे गीत' 'जयमाला' आदि फिल्मी गीतों के साथ 'हवामहल' जैसे रोचक कार्यक्रमों ने इस प्रसारण को व्यापक लोकप्रियता दी और इसने विज्ञापनों के बडे॰ भाग पर धीरे - धीरे कब्जा कर लिया। किन्तु रेडियो सिलोन का जादू लोगों पर लम्बे अरसे तक बना रहा। अमीन सायानी का कहीं कोई विकल्प नहीं बन पाया।

आज रेडियो सिलोन की कोई सत्ता नहीं रही। कार्यक्रम आते हैं , परन्तु शायद ही उसे कोई सुननेवाला हो।
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि  आजकल विविध भारती के अलावा भी रेडियो संगीत के कई अच्छे कार्यक्रम प्रसारित होते है , परन्तु एक सहृदय श्रोता के लिए उसका आनन्द उठा पाना सरल नहीं है। एक गाने के समाप्त होने और दूसरे गाने के आरम्भ होने के बीच विज्ञापनों की लम्बी भीड॰ के साथ - साथ अपने प्रसारण को और अधिक रोचक बनाने के लिए उस गाने के प्रस्तोता इतनी भोंडी॰ हरकतें करते हैं कि अगला गाना सुनने के लिए वहाँ रुके रहना असम्भव हो जाता है। ऐसी हरकतें अच्छे से अच्छे गानों का रसभंग कर देती हैं।

मेरे पास हिन्दी फिल्मों के पुराने और नये गानों का सी डी और केसेट के रूप में अच्छा संकलन है, परन्तु रेडियो पर इसे सुनने का आनन्द अलग है। वहाँ लगता हे कि हम इस आनन्द की व्यापक भागीदारी के एक अंग हैं।

रेडियो सिलोन के हिन्दी फिल्मों के प्रसारण की व्यापक भागीदारी हमें एक विशाल श्रोता परिवार की संवेदना से जोड॰  देती थी। अमीन सायानी की लचीली, परन्तु सधी प्रसारण पद्धति में किसी भोडे॰पन की तो कल्पना भी नहीं  की जासकती थी। आज वह अतीत केवल स्मृति मात्र बनकर रह गया है मगर उसकी मिठास की अनुभूति को समय में मिटाने की क्षमता कहाँ !
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Yaad Ataa Hai Gujaraa Jamaanaa 89


भीमसेन जोशी : याद आता है गुजरा जमाना 89

मदनमोहन तरुण

भीमसेन जोशी  : वह अपार्थिव आवाज

24 जनवरी 2o11 का वह दिन अब भी याद है जब समस्त माध्यमों से पं भीमसेन जोशी के इस संसार से विदा लेने का समाचार आया था। मन के भीतर दूरतक सन्नाटा पसर गया था। शास्त्रीय संगीत की दुनिया की उस दवंग आवाज की स्वर - लहरियाँ तो वैज्ञानिक साधनों की कृपा से अब भी हमारे चारों ओर गूंजती रहेगी , लेकिन पृथ्वीलोक का एक सपूत हमसे सदा के लिए विदा ले गया , यह कसक  मन के भीतर  हमेशा सालती रहेगी। ।
शास्त्रीय संगीत के विरल गायक भींसेन जोशी को सुनना किसी विरल अनुभव से कम नहीं होता था।
मैंने उन्हें आमने - सामने बैठकर कईबार सुना है और मेरे अन्तः में वे स्मृतियाँ अब भी यथावत अंकित हैं। भीमसेन जोशी का गायन जब शुरू होता तो उनकी पार्थिव काया मानों धीरे - धीरे अलाप के साथ पिघलने लगती और वह कुछ ही देर में विशाल जल- प्रवाह के रूप में परिणत हो जाती।पहले मानो लम्बी तरंगें मन- प्राणों में उतरकर एक सम्मोहनभरा वातावरण उत्पन्न कर देती और फिर सूक्ष्म तरंगों की मसृणता लहरों में और फिर लहरों से धीरे - धीरे ज्वार में परिणत हो जाती। नदी सागर बन जाती।मन का आकाश मेघाच्छादित हो उठता , बादल गरजने लगते ,हूह भरी हवाएँ चलने लगतीं और फिर शुरू होजाती विरल स्वर - लहरियों की झमाझम बरसात और श्रोता की दैहिक सत्ता सम्मोहनपूर्ण अनुभूति में परिणत होकर एक नये संसार में प्रक्षेपित हो जाती।

ऐसा था उनके गायन का विरल प्रभाव। स्वर की गहनता, उत्तानता, गरिमा, हिल्लोलमय स्वर - लहरियां श्रोता की दैहिक सत्ता को सृष्टि के सूक्ष्म तरंगों का अंग बनाकर विशद व्यापकता में परिणत कर देतीं।हम स्वयं शेष से अशेष बन जाते और हमारा पार्थिव परिवेश सकल ब्रह्माण्ड के आनन्दमय नाद का महाकाश बन जाता।
भीमसेन जोशी संसार के उन विरल महान गायकों में हैं जिनकी स्वर लहरियों  की उद्दामता, उदात्तता ,हमारी स्मृति और अनुभूति का चिरतर अंग बन जाती है।
हम केसेट , सीडी आदि के आभारी हैं , जिन्होंने इन महान विभूतियों के अपने - अपने लोक में चले जाने के बावजूद , इन्हें हमारी दुनिया में कायम रखा है।
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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 88


दूसरी भविष्यवाणी : याद आता है गुजरा जमाना 88

मदनमोहन तरुण

दूसरी भविष्यवाणी

24 दिसम्बर 1969 को जब मैंने गवर्नमेंट कालेज ज्वाइन किया , तब गौरीनाथ शर्मा जी की दूसरी भविष्यवाणी का सातवाँ महीना बीत चुका था और आठवाँ शुरू हो चुका था।

मुझे देखकर उन्होंने दो घोषणाएँ की थीं-
1. आप जिस मकान में रहते हैं ,वह गाय -भैंसों के रहने की जगह है,
2. आप वहाँ आठ महीना से ज्यादा नहीं रहेंगे।

उनकी दोनों ही बातें अक्षरशः सही निकलीं।

आदमी की भविष्यदृष्टि इतनी तथ्यवाही और सुनिश्चित हो सकती है ,इसका इससे बडा॰ प्रमाण क्या हो सकता है !

मनुष्य का आन्तः संसार असाधारण दिव्य शक्तियों का महागार है।इसमें जो जितना पा सकता है , पालेता है।संसार में ऐसे गुणी लोग बहुत नहीं हैं ,जो इन दिव्यताओं से समय - समय पर हमारा साक्षात्कार करा देते हैं ।
दृष्टि की भी अपनी एक विशेषता है। जब हम पहाड॰ की तलहटी से उसके आसपास जो देखते हैं ,पहाड॰ की ऊँचाई से वे चीजें ठीक वैसी ही और उतनी ही नहीं दिखाई देतीं।यदि हम पहाड॰ के नीचे का ही नजारा देखकर चल दिए होते और कोई उँचाई से दीखते परिदृश्य का चित्रण करता तो ऐेसे लोग भी जरूर निकल आते जो उनकी बातों को नकार देते। वायुयान से यदि पृथ्वी को देखें तो पूरा नजारा और भी अधिक विराटता में खुल जाता है। चाँद से पृथ्वी ठीक वैसी ही दिखाई नहीं देती , जैसी जमीन से।
आइन्स्टाइन ने स्वयं से यह प्रश्न किया था इस विराट ब्रह्माण्ड में हर छोटी - बडी॰ गतिचेतना किसी नियम से परिचालित है।इसका लघुतम भी अपार शक्तियों का पुंज है।
कृष्ण ने जब अपना विराट रूप अर्जुन को दिखाया  तो उसके पहले उन्होंने अर्जुन को वह दृष्टि प्रदान की जिससे वह विराट को देखने में सक्षम हुआ -
 

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ,
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।
( अर्जुन तू समान्य आँखों से मुझे नहीं देख पाएगा , मैं तुझे अपने योगैश्वर्य सम्भूत रूप - दर्शन के लिए दिव्यदृष्टि देता हूँ। )

तब अर्जुन ने कृष्ण के विराट स्वरूप का साक्षात्कार करते हुए महाभिभूत शब्दों में कहा -


पश्यामि देवांस्तवदेवदेहे ,सर्वास्तथा भूतविशेषसंघान,
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ -मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान।।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रण- पश्यामित्वां सर्वतोनन्तरूपम् ।

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं -पश्यामि विशवेश्वर विश्वरूप।।
( हे देव ! मैं आपके शरीर में समस्त देवों , भूत समुदायों, कमलासनस्थ ब्रह्मा, महादेव, सम्पूर्ण ऋषियों एवं दिव्य नागों को देखता हूँ। हे विश्वेश्वर !आपको अनेक भुजा , बाहु , उदर, नेत्रों से युक्त अनन्त के रूप में देखता हूँ। न आपका कोई आदि देखता हूँ , न मध्य , न अन्त ! )
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Yaad Aaataa Hai Gujaraa Jamaanaa 87


अखवार का वह पन्ना याद आता है गुजरा जमाना 87

मदनमोहन तरुण

अखवार का वह पन्ना

हमारी जिन्दगी कई बार हमसे रहस्यमय अजनवियों जैसा व्यवहार करती है  और जो हम अपने बारे में कभी सोचते भी नहीं , वह घटित हो जाता है। 

मेरी बहन का विवाह सम्पन्न होचुका था।मेरे बहनोई गुणीन्द्रमोहन मिश्र उनदिनों मुंसिफ मजिस्ट्रेट थे। बहनोई। हमदोनों ने ग्रैज्युएशन राँची काँलेज से ही किया था इसलिए हम जब भी मिलते राँची की यादें ताजा हो जातीं।यद्यपि वे विद्यार्थी तो अँग्रेजी साहित्य के रहे थे ,किन्तु कानून उनकी रुचि का विशेष क्षेत्र था और उसपर बातेम करना उन्हें बहुत पसन्द था। सम्भवतः पैत्रिक परम्परा के कारण। हम जब भी मिलते इन विषयों पर देर तक बातें चलती रहतीं।

एकदिन संध्या समय हम छत पर बैठे बातें कर रहे थे तभी अखवार का एक पन्ना कहीं से उड॰ता हुआ हमारे पास गिर पडा॰।गुनीबाबू ने उसे योंही उठा लिआ और उलट - पलट कर देखने लगे।फिर तनिक रुक कर उन्होंने कहा - इसमें तो यू .पी. एस. सी. का विज्ञापन है। वे विज्ञापन गौर से देखने लगे। बोले इसमें गवर्नमेंट कालेज दमण के व्यख्याता का पद है । पद गजटेड है।पेपर की तिथि पर ध्यान दिया तो पाया कि यह मात्र दो दिन पहले का है। उन्होंने मुझसे कहा कि आपको इस पद के लिए अपना आवेदनपत्र भेजना होगा।उन्होंने मेरे प्रमाणपत्र लिए और पटना चले गये। उसकी टाइप्ड कापियाँ तैयार करवाई , स्वयम अटेस्ट किया और लौट कर जहानाबाद आगये। उनदिनों अखवार के विज्ञापन के साथ ही यू .पी .एस .सी . का आवेदनपत्र का फार्म भी छपता था। मैंने फार्म भर दिआ और सर्टिफिकादि अटैच कर रजिस्टर्ड पोस्ट से भेज दिया। महीने भर बाद साक्षात्कार के लिए बुलावा भी आगया।
निश्चित तिथि को एक बैग में ,प्रमाणपत्र और अपनी कुछ प्रकाशित सामग्री लेकर रात्रि में हवडा॰ एक्सप्रेस से दिल्ली के लिए रवाना हो गया।

यात्रा करते समय मैं अखवार के उस पन्ने के बारे में सोच रहा था जो कहीं से उड॰ता हुआ हमलोगों के पास आ गिरा था।आज वही पन्ना हमें दिल्ली लिए जा रहा था। एक नयी यात्रा की ओर। जिन्दगी का एक अपना नियम है जो कई बार बहुत रहस्यमय होता है।कई बार अचानक ही उसमें नये - नये लोग शामिल हो जाते हैं , जिनके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था और वे कार्य सम्पन्न कर फिर कहीं तिरोहित हो जाते हैं।इसमें जड॰ और चेतन का भेद नहीं होता। जीवन रहस्यमय महीन धागों से बुना गया है जिसका हर धागा अपने आप में एक पूरा विराट संसार है।इसका साक्षात्कार हमें कभी - कभी ही हो पाता है और जब होता है तो इसका सम्मोहक चमत्कार हम अभिभूत होकर देखते ही रह जाते हैं।
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Yaad Ataa Hai Gujaraa Jamaanaa 86


पंडित गिरीन्द्रमोहन मिश्र : याद आता है गुजरा जमाना 86

मदनमोहन तरुण

द्विवेदीकाल के लेखक पंडित गिरीन्द्रमोहन मिश्र

 विक्रम में बाबूजी का संदेश मिला कि अपनी बहन के विवाह के निमित्त मुझे दरभंगा जाना है।जब मुझे मालूम हुआ कि वहाँ मुझे पंडित गिरीन्द्रमोहन मिश्र जी से मिलना है , तो मेरा उत्साह चौगुणित हो उठा।वे द्विवेदीकाल के हिन्दी के उन असाधारण लेखकों में हैं जिन्होंने पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी जी द्वारा सम्पादित हिन्दी की महान पत्रिका 'सरस्वती' में वैज्ञानिक विषयों पर लिखा और हिन्दी की श्री - सम्पदा के अभिवर्धन में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। पंडित। सुप्रसिद्ध आलोचक डाँ रामविलास शर्माजी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण'  मेंउनका ससम्मान उल्लेख किया है – ‘'जिस समय चारों तरफ वेदान्त के नाम पर विज्ञान -विरोधी अध्यात्मवाद का प्रचार-प्रसार हो रहा था उस समय गिरीन्द्रमोहन मिश्र जैसे थोड़े से लेखक थे जो प्रयत्न कर रहे थे कि शिक्षितजनों का  चिंतन विज्ञान की दिशा में बढे.।‘
 'सरस्वती' के मार्च 1913 में प्रकाशित गिरीन्द्रमोहन मिश्र जी के एक लेख ' मानवीय ज्ञान का क्रम विकाश ' की कुछ पंक्तियाँ देखिए - ' मानसिक अवस्थाओं और भौतिक परिवर्तनों में परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। अतएव बाहरी अनुभवों की वृद्धि से मानसिक अवस्थाओं में भी उन्नति होती है। हमारा ज्ञान हमारे मन की एक अवस्थामात्र है। वास्तव में प्रकृत संसार और मानसिक अनुभवों का का परस्पर वियोग असम्भव है।' हमें खेद है कि हिन्दी के अन्य प्रमुख इतिहासकारों ने पंडित जी पर चर्चा करने में कोताही की है। हो सकता है यह उनकी अपनी समझ की सीमा हो। 
1973 में गिरीन्द्रमोहन मिश्र जी ने मैथिली में ' किछु देखल किछु सुनल' शीर्षक से  अपने संस्मरणों की महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी। तीन सौ साठ पृष्ठों में विन्यस्त यह पुस्तक दो खंडों में विभाजित है।प्रथम भाग लेखक के निजी परिवारिक जीवनवृत्त से होता हुआ छात्रों के बीच स्वाधीनता की सुगबुगाहट , बंग विभाजन , महात्मा गॉधी का फैलता प्रभाव , न्याय- व्यवस्था, कचहरियों की भाषा ,  बिहार में हिन्र्दी अंग्रेजी पत्रकारिता का विकास और चुनौतियॉ , लेखक के कुछ वरिष्ठ शिक्षक , कुछ महत्वपूर्ण आई . सी . एस . अधिकारी , वकील ,न्यायाधीश , महत्वपूर्ण मुकद्दमे तथा दूसरे भाग में लेखक की दरभंगा राज की सेवा , भारत छोड़ो आन्दोलन , मुस्लिमलीग द्वारा डाइरेक्ट एक्शन,  साम्प्रदायिक दंगा ,मैथिली साहित्य परिषद , जमीन्दारी उन्मूलन विषयक अधिनियम तथा अन्य कई प्रासंगिक विषयों तक फैला हुआ है।यह पुस्तक किसी भी दृष्टि से स्वाधीनता संग्राम कालीन भारत का एक और इतिहास नहीं है , बल्कि औपचारिक इतिहास लेखकों को कई मौलिक अनुद्घाटित सामग्री प्रदान करने में समर्थ है।इस आलेख में मुख्यतः ऐसे ही प्रसंगों की चर्चा की गयी है जिनका या तो अन्यत्र उल्लेख नहीं है , अथवा उसी विषय की चर्चा , इस पुस्तक में वर्णित वृत्तांत से भिन्न है।जैसा कि लेखक ने लिखा है कि उसे जैसे - जैसे बातें याद आती गयीं , वह उसी रूप में लिखता चला गया। इस दृष्टि से विवरणसूत्र में फैलाव तथा कहीं –कहीं बिखराव भी है। इस आलेख में प्रयास किया गया है कि एक विषय के सारे सू्त्र एक ही साथ प्रस्तुत कर दिये जाएँ।
        बंग - विभाजन लेखक की छात्रावस्था की उन महत्वपूर्ण घटनाओं में है जिसने देशव्यापी प्रभाव डाला और लोगों की स्वाधीनता की चेतना को पूरी प्रखरता से उद्बुद्ध कर दिया।उनदिनों लेखक एफ . ए. के छात्र थे और राजेन्द्र बाबू बी . ए . के।राजेन्द्र बाबू 1902 में छपरा जिला स्कूल से एंट्रेंस की परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त कर प्रसिद्धि प्राप्त कर चुके थे तथा वे बाद में एफ. ए . , बी. ए . और एम . ए.  , की परीक्षाओं में भी कलकत्ता विश्वविद्यालय में प्रथम आए।राजेन्द्र बाबू अच्छे विद्यार्थी होने के साथ- साथ छात्र संगठनों की गतिविधियों में भी भाग लिया करते थे।
लेखक ने 1908 में मुजफ्फरपुर में आयोजित इसके एक सम्मेलन में बाबू राजेन्द्रप्रसाद जी से सम्बध्द एक प्रेरक प्रसंग की चर्चा की है जो उनके भावी व्यक्तित्व के स्वरूप की एक झॉकी प्रस्तुत करता है।सम्मेलन का आयोजन वहॉ के लंगट सिंह काँलेज में किया गया था।उन दिनों उस कॉलेज का नाम भूमिहार ब्राह्मण कॉलेज था।बाद में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह की प्रेरणा से उसका नाम उसके संस्थापक बाबू लंगट सिंह के नाम पर रखा गया।आयोजित छात्र सम्मेलन का स्थान स्टेशन से कुछ दूरी पर था। आगन्तुक छात्रों को वहॉ से लेजाने के लिये घोड़ागाड़ी की व्यवस्था की गयी थी तथा साथ का सामान ले जाने के लिए कुछ स्वयंसेवक भी नियुक्त थे।भाग लेनेवाले छात्रों की तुलना में घोड़ागाडियों  की संख्या पर्याप्त नहीं थी।जब राजेन्द्र बाबू ट्रेन से उतरे तब अन्य छात्रों से प्रतीक्षा का कारण पूछा।उन्होंने बताया कि वे घोड़ागाड़ी के लिये प्रतीक्षा कर रहे हैं।यह सुनकर राजेन्द्र बाबू क्षुब्ध होगये और उन्होंने कहा कि यह खेद की बात है कि आपलोग इस उम्र में पैदल न जा कर घोड़ागाड़ी की प्रतीक्षा कर रहे हैं ? उन्हों ने जरा भी प्रतीक्षा नहीं की अपना सामान उठाया  और चल पड़े। अपनी असाधारण प्रखरता के लिये वे विद्यार्थी जीवन में ही बहुत प्रसिध्द थे तथा छात्र समुदाय में उनकी व्यापक प्रतिष्ठा थी।उनका अनुसरण करते हुए अन्य बहुत से छात्र उनके साथ चल पड़े। कुछ ही देर  बाद सभी लोग सभास्थल पर थे।( 7 )


पुस्तक की भाषा मैथिली होने के कारण उसे वह प्रचार - प्रसार नहीं मिल सका , जिसकी यह पुस्तक हकदार है। मुझसे पंडित जी के पुत्र पंडित गोविन्दमोहन मिश्र जी ने , पटना हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश , मुझसे अनुरोध किया था कि मैं उस पुस्तक का हिन्दी में अनुवाद करूँ। मैंने उसके करीब सौ पृष्ठों का अनुवाद भी किया है , परन्तु स्वयम अपनी ही लेखन - व्यस्तता के कारण अभीतक  वह काम आगे नहीं बढा॰ पा रहा हूँ , जिसका मुझे बहुत अफसोस है। सुनिश्चित रूप से यह एक महत्वपूर्ण पुस्तक है जो अधिक - से - अधिक पाठकों तक पहुँचनी चाहिए। 

यह 1966 के जून का महीना था ।
कडा*के की धूप और लू में करीब तीन बजे जब उनके निवासस्थान पर पहुँचा, तो मैं पसीने से करीब – करीब नहा गया था।बाहर बरामदे में लगी बेंच पर बैठ गया और उनके नौकर से संदेश भेज दिया।उन्होंने तुरत बुला लिया।कानून की पुस्तकों से ठसाठस भरे कक्ष में खादी की सफ्फाक गंजी और धोती पहने गौर वर्ण, सिकुड़न मुक्त भास्वर मुखमंडल, ,प्रशस्त ललाट , ललाई लिए भरे सहृदयतापूर्ण ओष्ठ और ऑखों की पारदर्शी पुतलियों पर झुकती नर्म पलकों वाले उन सुप्रसिध्द विधिवेत्ता, राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार ने जिस स्नेहिल आत्मीयता से मेरा स्वागत किया था ,उस प्रभाव को भुला पाना असम्भव है। उम्र  अस्सी को छू रही होगी ।मेरे सामने जैसे स्वयं इतिहास पुरुष बैठा हुआ था। उनके व्यक्तित्व की भव्यता में एक  औदार्यपूर्ण विशिष्टता थी  जो सामने बैठे व्यक्ति को किंचित भी बोझिलता का एहसास नहीं कराती थी। बरसों बाद उनकी इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मेरे लिए यह समझ पाना सरल नहीं था कि इस विभूतिमय व्यक्तित्व ने अपना आलोक मंडल इतनी सरल सहजता से कैसे सम्हाल रखा था।
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