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Friday, September 30, 2011

Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 73

याद आता है गुजरा जमाना 73

मदनमोहन तरुण

'ब्रह्मचर्य ही जीवन है'

अगले दिन सवेरे भी मेरी नींद देर से खुली। बात यह है कि हमदोनों रातभर एक पल के लिए भी सो नहीं पाते थे।हम एक अकथनीय सम्मोहन में बँधे थे।बातें करते तो करते ही चले जाते, किस विषय पर , कहना असम्भव है। बातों के क्रम में ही शरीर संगीत का तरल प्रवाह बनकर बह निकलता। दो शरीरों के घुल कर एकाकार होने का यह अनुभव अकथनीय है। आनन्द की ऐसी चरम अनुभूति की तो कभी कल्पना भी नहीं की थी। इसी स्थिति में जागृति कब सपने में ढल जाती और सपना कब नींद बन जाता कहना कठिन था।

जब मैं जागता तबतक मेरी श्रीमती जी बाहर जा चुकी होतीं। मैं सोचकर दंग रह जाता कि यह कैसे सम्भव है । आखिर वे भी तो मेरे साथ ही जागती रहती हैं ? इतना ही नहीं मेरे जागने तक वे स्नानादि से निवृत्त हो जातीं , वह भी ठंढे पानी से। मेरे लिए तो यह सोच पाना भी कठिन था। मेरी जिन्दगी बदल चुकी थी। मैं एक रहस्यलोक का प्राणी बन चुका था जिसे दिन की रोशनी बुरी लगने लगी थी। दिन होते ही मैं यह सोचने लगता कि रात कब होगी। मेरा मन कहीं नहीं लगता था।

जागने के बाद जब मैं बाहर निकला तो देखा पिताजी सामने खडे॰ हैं। उन्होंने तनिक व्यंग्य से मेरी ओर देखते हुए कहा - 'तो आप जग गये ?' मैं चुप रहा । तनिक रुक कर उन्होंने कहा- 'आपको आज ही राँची जाना होगा। पढा॰ई में बहुत बाधा हो रही है।' उनकी बात सुनकर मैं स्तंभित रह गया। मैं अबतक यह भूल चुका था कि राँची भी कोई जगह है जहाँ मुझे जाना होगा और यह भी कि मैं अभी विद्यार्थी हूँ।' उनकी बातों के झटके से मैं सिर से पाँव तक काँप गया।

बाबूजी अपना आदेश सुना कर चले गये। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ? खास कर मैं पत्नी के लिए चिन्तित था कि वे अकेले कैसे रहेंगी। मेरे राँची जाने का तात्पर्य था करीब छह महीने तक घर से बाहर , एक - दूसरे से दूर रहना। मैं स्वयं को सम्हाल नहीं पा रहा था। मैं तुरत माँ के पास चला गया और कहा -' मेरे राँची जाने की तैयारी करो। बाबूजी ने कहा है मुझे वहाँ आज ही जाना होगा।' मेरी बात सुनकर माँ चकित रह गयी। उसने तुरत बाबूजी को घर के भीतर बुलवाया और कहा - ' अभी इसके विवाह के कुल दो दिन गुजरे हैं और आप इसे राँची जाने को कह रहे हैं? आपने यह क्यों नहीं सोचा कि इन दोनों के मन पर इसका कैसा प्रभाव पडे॰गा ?' माँ ने घोषणा की कि ' आगामी पन्द्रह दिनों तक यह कहीं भी नहीं जाएगा।' बाबूजी पन्द्रह दिनों के लिए नहीं माने ।उन्होंने अपना आदेश दस दिनों के लिए स्थगित कर दिया। इससे मुझे राहत मिली।

बाबूजी जहानाबाद चले गये। रात में वहाँ से लौटने के बाद उन्होंने मुझे बुलाया। मैं डरता - डरता उनके पास गया। मैं यही सोच रहा था कि पता नहीं इस समय वे कौन - सा नया आदेश देते हैं। उन्होंने मुझे एक पीले कवर की पुस्तक दी और कहा इसे आज पढ॰ जाना और इस पर अमल करना। उस समय हमारे आसपास कई लोग आचुके थे। जब मैं वहाँ से चलने लगा तब बाबूजी ने मुझे रोक कर कहा - 'सद्यः बल हरा नारी।' फिर उसका हिन्दी में अनुवाद करते हुए कहा - 'स्त्री तुरत ही पुरुष के बल का हरण कर लेती है।' इसे सुनते ही आसपास खडे॰लोग ठहाका मारकर हँस पडे॰। मुझे बहुत बुरा लगा। मैं वहाँ से तुरत ही चला आया। मैं जनता था कि बाबूजी मेरे अपमान का कोई भी अवसर कभी चूकते नहीं थे।

कमरे में जाकर मैंने उस पुस्तक का शीर्षक पढा॰ - 'ब्रह्मचर्य ही जीवन है और वीर्यनाश ही मृत्यु है'। पुस्तक का शीर्षक पढ॰ते ही मैं चिढ॰ गया। मेरे भीर एक तीखी प्रतिक्रिया हुई और सवाल उठा - अगर ब्रह्मचर्य ही जीवन है तो मेरा जन्म कैसे हुआ ? स्वयं लेखक की पैदाइस कैसे हुई? और यदि वीर्यनाश ही मृत्यु है तो दुनिया भर के विवाहित लोग जीवित कैसे हैं ?

पुस्तक के करीब हर पृष्ठ में स्त्री को दुर्गुणों के भंडार के रूप मे बताया गया था। लेखक का कहना था कि औरत आगर किसी पुरुष को देख भी ले तो उसका ईमान- धर्म सब चला जाता है। पुरुष पशु की तरह उसके पीछे लग जाता है। जैसे स्त्री सेक्स की मशीन हो और इसके अलावा उसकी और कोई सत्ता नहीं हो। वीर्यनाश के बारे में भी लेखक के विचार आत्यंतिक थे। उसकी मान्यता थी की वीर्य की एक बूंद का भी नष्ट होना आयु क्षीणता का और अनेक रोगों का कारण बन सकता है।

वह पुस्तक मुझे डरा नहीं सकी। पुस्तकों के मामले में मुझमें पूरी परिपक्वता थी। अच्छी और घटिया पुस्तक का अंतर करना मेरे लिए कठिन नहीं था। मुझे लगा यह किसी नपुंसक लेखक की रचना है जो अपनी पत्नी से अपना भेद छुपाता भागता फिर रहा है। मैंने उस पुस्तक को बिछावन के नीचे छुपा कर रख दिया और उसकी ओर दोबारा कभी देखा नहीं।

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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 72

याद आता है गुजरा जमाना 72

मदनमोहन तरुण

बेचैनीभरी पुकार

सबेरे जब मैं जगा तो काफी देर हो चुकी थी।श्रीमती जी न जाने कब स्नान -ध्यान से निवृत्त हो चुकी थीं। मेरे लिए स्वयं को पहचानना कठिन हो रहा था। मुझे स्पष्ट लग रहा था कि मेरे भीतर कुछ सर्वथा नवीन घटित हो चुका है। क्या ? मैं समझ नहीं पा रहा था। जब मैं कमरे से बाहर निकला तो भाभियों ने जिस तिर्यक दृष्टि से मुझे देखा , उसका सामना मैंने पहले कभी नहीं किया था। भाभी ने चुहल करते हुए पूछा- 'कैसी रही कल की रात? ' दूसरी भाभी ने एक और रहस्यमय सवाल जोड॰ दिआ - ' हार - जीत का फैसला हुआ या नहीं ? कौन जीता , कौन हारा?' मेरे लिए यह प्रश्न सचमुच अनबुझ था। यह जीत - हार क्या ? मैं किसी युद्ध पर तो गया नहीं था ? मुझे चुप देख कर भाभियों की किलकार और भी तेज हो गयी। तभी मेरी दादी ने उनलोगों को प्यार से झिड॰का - 'मेरे पोते को तंग मत करो तुम लोग।' कहकर दादी मेरे पास आयीं और बडे॰ प्यार से मेरे सिर पर अपना हाथ रखा। जब मैं बाहर गया तो मामा जी ने पूछा- 'कहो कैसी रही ?' इस प्रश्न पर मुझे चुप देखकर उन्होंने अपना प्रश्न बदल दिआ और पूछा - 'कहो , बहू पसन्द आई ?' मैने सकारात्मकभाव से सिर हिलाया।

मैं सब से बातें कर रहा था , सब तरफ घूम - फिर रहा था लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था। मेरे मन में एक ही प्रबल इच्छा थी -अपनी पत्नी को देखने की। मैं कोई - न - कोई बहाना बनाकर कई बार घर के भीतर जा चुका था , परन्तु पत्नी से मिल नहीं पाया। वे माँ के साथ - साथ थीं। मैं उन्हें बुलाकर मिलूँ, यह साहस जुटा नहीं पा रहा था। जिसे रात में लालटेन की पीली रोशनी में देखा था , उसे दिन के उजाले में देखने को मैं बेचैन हो रहा था। पत्नी को देखे बिना मुझसे रहा नहीं जा रहा था। जिस औरत से मैं केवल एकबार मिला था , उसके सामने मुझे पूरी दुनिया बेकार लग रही थी। मामा जी मेरी भावनाओं को समझ रहे थे। उन्होंने मुझसे कहा - 'मैं तुम्हारी बेचैनी समझ रहा हूँ। मैं भी इस दौर से गुजर चुका हूँ। ऐसा ही लगता है और अब से सदा ऐसा ही लगेगा। ईश्वर ने स्त्री - पुरुष का यह कैसा अद्भुत खेल रचाया है ? यह बहुत ही रहस्यमय है। अब तुम्हारी पत्नी केवल एक स्त्री नहीं है, वह अब तुम्हारी अर्धांगिनी है और अब तुम भी उसके बिना पूर्ण नहीं होसकते। तुम्हारी बेचैनी तुम्हारे आधे अंग से जुड॰ने की बेचैनी है।' मामा जी ने बडी॰ सरलता से वैवाहिक जीवन का एक बडा॰ सत्य मेरे सामने प्रकट कर दिया था।मुझे अपनी अनबुझ बेचैनी का करण मिल गया था। मैं शांत हो गया।फिर भी कितना विचित्र था यह सब ! दो सर्वथा अनजाने लोग एक ही रात में एक - दूसरे के लिए अपरिहार्य हो चुके थे। मैं सोच हा था - क्या सचमुच विवाह स्वर्ग में ही तय हो जाते हैं ? क्या हर जोडी॰ को ईश्वर अपने ही हाथों से बना कर इस संसार में भेज देता है और समय आने पर वे यहाँ अपनी जोडि॰याँ बना लेते हैं ?

पत्नी से मिलना अब रात में ही सम्भव था। दिन में नवविवाहित के मिलने का चलन उनदिनों नहीं था।

रात में जब मैं पत्नी से मिला तो मैंने उन्हें अपनी दिनभर की बेचैनी के बारे में बतलाया।थोडी॰देर चुप रहकर सलज्जभाव से उन्होंने भी मेरा समर्थन करते हुए कहा - 'मुझे भी ऐसा ही लग हा था।' निश्चित रूप से यह आकर्षण मात्र दैहिक ही नहीं हो सकता। यह बेचैनीभरी पुकार कहीं भीतर से आती है।

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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 71

याद आता है गुजरा जमाना 71

मदनमोहन तरुण

हमारी सुहागरात

घर पर हमलोगों के स्वागत की भव्य तैयारी थी।पूरा घर आमंत्रित सम्बन्धियों से भरा था।मेरी तीन फुफेरी भाभियों के आने से घर का कोना - कोना हँसी - मजाक की किलकारसे भर उठा था। माँ का उत्साह उसके चेहरे से ज्योति की तरह फूट रहा था। मेरी दादी गीत गारही थीं।दरवाजे पर आरती से हम पति - पत्नी का माँ ने स्वागत किया। उसके बाद हमदोनों को कुलदेवता के घर में ले जाया गया। कुलदेवता के स्थान पर हर किसी को जाने की अनुमति नहीं थी। जबतक घर में माँ नहीं आई थी, तबतक यह पूजा मेरी दादी करती थीं।उसके बाद माँ करने लगी। यह पूजा साल में एक बार की जाती थी ,अन्यथा ऐसे विशिष्ट अवसरों पर।

कुलदेवता की पूजा के बाद हमने दादी , दादाजी , माँ और बाबूजी के पाँव छूकर आशीर्वाद लिये। उसके बाद घर में हमारे जितने भी कुल - कुटुम्ब के लोग आए हुए थे उनके पाँव छुए।

हमें उस दिन सत्यनारायण पूजा के सम्पन्न होने तक उपवास करना था।इस बीच केवल फल खाने की अनुमति थी। भूख के नाम पर मैंने पूजा के पहले तक इतना फल खाया कि साधारण दिनों में मैं उतना भोजन भी नहीं कर पाता था।

इस बीच भाभियों ने मेरी पत्नी से परिचय कर लिया था। वे उनकी देखभाल में लगी थीं। घर और मुहल्ले के लोगों में नई बहू को देखने का कौतूहल था । इस बीच दादी , माँ और भाभियों ने उनका मुँह देख लिया था जिससे सब को राहत मिली थी। सभी को बहू बहुत पसन्द आई। सब ने मुझे बधाइयाँ दी। गोतिया लोगों के मुँह देखने का समय सत्यनारायण पूजा के बाद रखा गया। पता नहीं किसकी कैसी नजर हो !

पत्नी के ट्रेन में खो जाने की कहानी को मेरे मामा जी ने परिवार के सामने खूब नमक- मिर्च लगाकर परोसा। जिसने भी इस प्रसंग के बारे में सुना उसी ने खूब चुटकी ली। इस प्रसंग की चर्चा ने वातावरण को और भी जीवंत कर दिया। भाभियों ने मेरी पत्नी को चुहल भरे शब्दों में सावधान करते हुए कहा - 'देखो बहू ! अपने दूल्हे को सम्हाल कर रखना। कहीं बबुआजी किसी और को चाकलेट खिलाने न लग जाएँ!'

सम्मोहन और किलकार से भरे इस वातावरण में किसी को समय का पता नहीं चला सबकुछ स्वाभाविक गति से होता चला गया। इसी बीच सत्यनारायण पूजा भी सम्पन्न हो गयी।

उसके बाद कुछ देर तक मुँह-दिखाई की रस्म चलती रही।

उसके बाद भोजनादि की तैयारी चलती रही। परम्परा के अनुसार ऐसे अवसरों पर भोजन पुरुष ही बनाते थे। उस दिन गोतिया - भाइयों के साथ भात , दाल, तरकारी खाना जरूरी था । जमीनको खोद कर बडा॰ - सा चूल्हा बनादिया जाता था । भोजन नई मिट्टी के बर्तन में बनता था। वह कुम्हार का भी दिन होता था । कुम्हार उस दिन बर्तन खूब नेग-जोग लेकर देते थे। परिवार इस अवसर पर कोई कोताही नहीं करता था। एक - दूसरे के लिए पूरे गाँव की अपरिहार्यता का बोध ऐसे ही समय पर होता था।भोजन के लिए पूडी॰ - मिठाई हलवाई बनाते थे। घर की सबसे बुजुर्ग स्त्री भोजन बनना शुरू होने के पहले खूब नेग - जोग देकर चूल्हे की पूजा करती थी ,तब भोजन बनना शुरू होता था। जब ब्राह्मण भोजन करना शुरू कर देते थे तब दूसरी पंक्ति में गाँव के और अन्य गाँवों से आने वाले लोगों को भोजन कराया जाता था। इस अवसर पर एक हजार से अधिक लोगों ने भोजन किया था। भोजन का यह सिलसिला रात के बारह बजे के बाद तक चलता रहा। बाबूजी और बाबा के परिचितों और निकटस्थ लोगों की संख्या बहुत बडी॰ थी।भोजन पत्तल पर परोसा जाता था और मिट्टी के गिलास में पानी दिया जाता था।एक पंक्ति के भोजन करते ही सफाई कर दी जाती और दूसरी पंक्ति के बैठने की व्यवस्था हो जाती। परिवार के कई सदस्य घूम - घूम कर देखते रहते कि कहीं किसी को भोजन परोसने में कमी न रह जाए। लोगों को पूरे आग्रह के साथ भोजन कराया जाता था।भोजन का समापन दही और चीनी परोस कर किया जाता था। उसके बाद पान की व्यवस्था थी। समारोह की सफलता लोगों के सहयोग पर निर्भर थी । ऐसे अवसों पर कुछ दुष्टलोग भी आजाते थे जिनका उद्देश्य होता कि कहीं कुछ शरारत की जाए। ऐसे लोग भोजन से ज्यादा खाना ले लेते थे और पूडी॰ और मिठाई पत्तल के नीचे डालते चले जाते थे ताकि कमी हो जाए। भोजन कराने की कला में कुशल लोग इस चेष्टा पर भी ध्यान रखते थे।

बारात से लौट कर आनेवाले सभीलोग बहुत थके हुए थे इसलिए भोजन कराकर उनके सोने की व्यवस्था भी कर दी गयी थी।

इस दिन का नवदम्पति के जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान था।यह उनके मिलन की पहली रात थी , जिसे सुहाग रात कहा जाता था।यह दो व्यक्तियों के तनमन से एक होने का दिन था।यह सारा समारोह हमारे गाँव के घर में हो रहा था।जहाँ लालटेन और ढिबरी से काम चलाया जाता था। आज के विशेष अवसर के लिए कई पेट्रोमैक्स भी मँगा लिए गये थे, जिनका उपयोग बाहर - भीतर लोगों के खिलाने के लिए हो रहा था। हम पति - पत्नी के सुहागरात की व्यवस्था उत्तर दिशा वाले घर में की गयी थी जहाँ मेरी माँ शादी के बाद आई थी । नवदम्पति के लिए यह कमरा एक पूरी परम्परा का प्रतीक था। कमरे में एक लालटेन जल रहा था।खाट की तोसक पर नई रंगीन चादर बिछाई गयी थी। दो तकिए रखे हुए थे। घर की दीवारों पर चौरेठा और हल्दी से कई चित्र बनाये गये थे। इसे कोहबर लिखना कहा जाता था। भाभियों ने हमदोनों को कमरे के भीतर पहुँचाकर दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया। बहुत देर तक उकी खिलखिलाहट की आवाजें आती रहीं। किसी अकेली स्त्री के साथ किसी बन्द कमरे में अकेले होने का मेरा यह पहला अनुभव था। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ। श्रीमती जी साडी॰ में सिमटी घूँघट डाले खाट के एक सिरे पर सिमटी - सिकुडी॰ बैठी थी।मैं भी एक सिरे पर देर तक चुपचाप बैठा रहा। अब मैंने साहसपूर्वक श्रीमती से पूछा - 'आपका नाम क्या है ?'

हालाँकि मैं उनका नाम जानता था ।परन्तु मेरे सामने चुनौती यह थी कि पूछूँ तो क्या पूछूँ। थोडी॰देर में सलज्ज स्वर में जबाब आया ' माधुरी।' किसी स्त्री की ऐसी आवाज मैंने इसके पहले कभी नहीं सुनी थी। इस आवाज ने मेरे भीतर झुरझुरी पैदा कर दी। मैं थोडा॰ आगे बढा॰ और घूँघट हटाया। लालटेन की पीली मद्धिम रोशनी में एक चेहरा खिल कर सामने आगया। गोलाई लिए एक गोरा चेहरा। लम्बी नाक। पतले आकर्षक होंठ। बडी॰ नशीली आँखें।उस चेहरे को मैं देखता रह गया।मन जैसे सम्मोहन के जादू में बँध गया।ऐसी पत्नी देने के लिए मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया। फिर मैंने फूछा - 'मैं आपको अच्छा लगा?' श्रीमती ने सिर हिलाते हुए कहा - 'जी।' और पूछा -"और मैं?' मेरे पास शब्द नहीं थे। मैं आभिभूत उस चेहरे को एकटक निहारता रहा। सहसा विश्वास नहीं हो रहा था कि जिन सुन्दरी स्त्रियों की परिकल्पना मैं अपनी कविताओं में करता था आज वही मेरे सामने है।इस अवसर पर पति , पत्नी को कुछ देता है। मेरे पास कुछ भी नहीं था। मैंने इसी अवसर के लिए एक रुमाल खरीदा था। वही मैंने चुपचाप श्रीमती के हाथों मैं दे दिया।आज पचास वर्षों के बाद भी वह रूमाल ठीक उसी प्रकार तह करके सुरक्षित रखा हुआ है।

बहुत - सी चीजें हम नहीं जानते और वे सहज भाव से सम्पन्न हो जाती हैं।

इस बीच न जाने कब क्या हुआ कि मैंने श्रीमती को अपनी बाहों मे लेलिया।मेरा पूरा शरीर जैसे सितार की तरह बज उठा। एक ऐसी झंकार मेरे रोम -रोम में फैल गयी जिसकी किसी वादक ने इसके पहले कल्पना भी नहीं की होगी। खुछ देर बाद जैसे हमदोनों के शरीर तरल इकायों में बदल गये।हम जैसे एक - दूसरे में घुल कर एकाकार होगये और आनन्द का एक ऐसा निर्झर झरने लगा कि हमें अपनी सत्ता का कोई बोध नहीं रहा।

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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 70

याद आता है गुजरा जमाना 70

-मदनमोहन तरुण

मेरी पत्नी बदल गयी होती !

विवाह के बाद भी मैंने अपनी पत्नी की एक झलक नहीं देखी थी, इस बात को जिसने भी सुना, उसीने आश्चर्य प्रकट किया और इसकी आलोचना की।विवाह के बाद उनकी विदाई तीन वर्षों के बाद होगी , इस बात से घर में बहुत आक्रोश था। विशेषकर माँ को निराशा हुई।माँ ने कहा यदि उन्होंने विवाह के पहले ही इस प्रथा के बारे में बताया होता तो मैं कभी यह शादी उनके घर नहीं करती।इस बात को लेकर माँ की पिताजी से कई बार कहा - सुनी होगयी। अन्ततः पिताजी ने मेरे श्वसुर जी से बात की और उन्हें पूरे परिवार की भावनाओं से अवगत कराया। इसका परिणाम यह हुआ कि तीन वर्षों की विदाई की अवधि एक वर्ष में परिणत हो गयी।

आखिर वह समय भी आ ही गया। हम परिवार के करीब पचीस लोग विदाई के लिए श्वसुराल पहुँचे।वहाँ हमलोगों का भव्य स्वागत हुआ और दूसरे दिन विदाई हुई। शादी और विदाई का यह सबसे व्यस्त महीना था और जिसदिन हमलोगों को लौटना था वह शायद सबसे अधिक लग्न का समय था। यही सोचकर हमलोग अपने कुटुम्बियों में दो पहलवान किस्म के लोगों को लेकर आए थे, ताकि वे हमें किसी तरह ट्रेन में चढा॰ सकें। हमलोगों का अन्दाज सही निकला। विदाई के बाद जब हमलोग स्टेशन पहुँचे तो वहाँ असाधारण भीड॰ थी।प्लेटफाँर्म कहीं पाँव टिकाने जगह नहीं ती। स्थान - स्थान पर बारातियों की भीड॰ थी । नये - नये जोडे॰ रंगीन कपडों में ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहे थे। हमलोगों के साथ हमारे मामा जी थे जो बडी॰ मुस्तैदी के साथ सबको हिदायतें दे रहे थे कि ट्रेन पर कैसे सवार होना है। हमलोगों के साथ काफी सामान भी था। हम प्रतीक्षा कर ही रहे थे कि ट्रेन के आने की आवाज सुनाई पडी॰ । इसबात से चारो ओर अफरा - तफरी मच गयी।ट्रेन जब प्लेटफार्म पर पहुँची तो वह नजारा दहला देनेवाला था।पूरे ट्रेन में जैसे पाँव रखने की भी जगह नहीं थी। अनेकों लोग डब्बों के हैंडल से लटके हुए थे ,सैंकडों लोग ट्रेन के छज्जे पर सवार थे।कुछ भी सोचने का समय नहीं था। हमारे पहलवान से सम्बन्धी आगे बढे॰ और उन्होंने बहुत जोरों से 'जय बजरंगबली' का नारा लगाया और लोगों को रपटते - झपटते ट्रेन पर सवार होगये और उनके पीछे - पीछे हम सभी लोग । अब हमसब ट्रेन के कम्पार्टमेंट में थे।थोडी॰ ही देर में ट्रेन चलपडी॰।अब मैं अपनी पत्नी को ढूँढ॰ने लगा।सामने की सीट पर देखा कि एक नवविवाहिता युवती ठीक वैसे ही कपडे॰ में ,जैसा मेरी पत्नी पहने थीं, सामने की सीट पर बैठी है। मैंने समझ लिया कि यह मेरी ही पत्नी है जो मेरे साथ - साथ ट्रेन पर सवार हुऐ और सामने जगह बना कर बैठ गयी। मैंने भी उन्हीं के पास थोडी॰ जगह बनाई और बैठ गया।मेरी जेब में काफी चाकलेट थे। मैने एक चाकलेट उनकी ओर बढा॰या।उन्होंने तुरत चाकलेट लेलिआ।इसी बीच मैंने उनके घूँघट के भीतर झाँक कर देखा।यह मेरी गहरी निराशा का पल था। उस युवती का चेहरा पतला - सा अस्थिप्रधान था। वह गोरी जरूर थी ,परन्तु भावविहीन और सपाट चेहरेवाली औरत थी जो निर्विकार भाव से मेरे द्वारा दिआ गया चाकलेट खा रही थी। उसे जैसे मेरी उपस्थिति से कुछ भी लेना -देना नहीं था।

मुझे लगा मेरे साथ धोखा हुआ है। क्या अब मुझे इस औरत के साथ अपना पूरा जीवन बिताना होगा?मै समझ नहीं पा रहा था कि मै खुद पर हँसूँ या रोऊँ। मुझे अब अपने पिताजी पर क्रोध आ रहा था कि उन्होंने बिना देखै समझे इस बन्धन में बाँध दिआ।मैंने गहरी निराशा से सामने देखा। देखा कि मेरे ठीक सामने एक युवक नये कपडे॰ पहने और हाथ में मोटी - सी लाठी लिए खडा॰ है और मेरी ओर करीब - करीब जलती निगाहों से घूर - घूर कर देख रहा है। वह कुछ बोला नहीं। मैंने समझा इस भीड॰ में उसकी पत्नी कहीं और बैठ गयी है ,इसीलिए वह हमदोनों को साथ बैठे देख कर ईर्ष्या से इस तरह घूर - घूर कर देख रहा है। मैंने उसकी ओर ध्यान नहीं दे सका।अब मैं अपने मामाजी को ढूँढ॰ने लगा जिनसे मैं सबसे अधिक निकट था । मैं इतना निराश था कि तुरत उन्हें अपनी भावनाओं से परिचित कराना चाहता था। परन्तु वे आस -पास में कहीं भी नही दिखे। तभी मुझे मेरी दासियाँ दिखाई दीं जो साथ आ रही थीं। वे शायद मुझे ही ढूँढ॰ रही थीं। उनलोगों ने मेरे मामा जी को बताया। जानकर मेरे मामा जी मेरे पास किसी तरह भीड॰ को चीरते हुए मेरे पास आए। मुझे इस नवविवाहिता के पास बैठे देख कर बोले - ' यह तुम किसके साथ बैठे हो! तुम्हारी पत्नी तो उस तरफ है।'मैंने उनकी ओर सुखद आश्चर्य से देखा। मेरे चेहरे का तनाव मिट गया। मुझे राहत मिली। बिना देरी किए मैं उस स्थान से जैसे ही उठा , वैसे ही सामने लाठी लेकर खडा॰ युवक तुरत उस युवती के पास बैठ गया। जरूर वह उसका पति होगा जो इतनी देर तक अपने को सम्हाले हुए था।मेरे पास कुछ और सोचने का समय नहीं था।

मैं लपकता हुआ मामाजी के साथ आगे बढ॰ गया।मामाजी ने मेरी पीठ पर हाथ रखते हुए सामने बैठी सुन्दरी युवती से कहा - 'लो बहू !सम्हालो इसे। यह है तुम्हारा पति।यह उस ओर किसी और नवविवाहिता के साथ बैठा था।' सुनकर उस गोरी ,सुन्दरी युवती की मुस्कान उसके पूरे चेहरे पर फैल गयी और उसका चेहरा आरक्त हो गया।उसे देखकर मेरा ह्रदय हिल्लोलें लेने लगा। मैं सचमुच इतना प्रसन्न इसके पहले कभी नहीं हुआ था। मैंने ईश्वर को शतशः धन्यवाद दिआ। यह मेरी मनोकामना के अनुकूल पत्नी थी। मेरी कविताओं की तरह मोहक।

मैंने अपनी जेब को टटोला तो पाया कि उसमें अब एक भी चाकलेट शेष नहीं बचा था।वह युवती सारे चाकलेट खा चुकी थी।परन्तु मुझे इस बात की अब कोई चिन्ता नहीं थी।चाकलेट भले खत्म होगया हो , परन्तु मुझे इसपल जिस मिठास का अनुभव होरहा था वह भला और कहाँ मिल सकता था ! मैं इस पल संसार का सबसे सुखी इंसान था।

तब से अबतक इक्यावन वर्ष बीत चुके हैं और हम पति -पत्नी , ईश्वर की दया से अपने बाल - बच्चों के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

परन्तु, उस ट्रेन की घटना को मैं अबतक भुला नहीं पाया हूँ। सोचता हूँ अगर मामाजी नहीं होते और मैं उस दूसरी औरत को लेकर घर आगया होता तो !

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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 69

याद आता है गुजरा जमाना 69

मदनमोहन तरुण

वह कौन थी ?

बाबूजी ने मुझे राँची से जहानाबाद बुला भेजा। कारण कुछ भी नहीं बताया गया था।मैं इस तात्कालिकता का मतलब समझ नहीं पया। अब तक मैं कभी इस तरह पढा॰ई के बीच में घर नहीं गया था। वहाँ मैं केवल छुट्टियों में ही जाता था। मुझे चिन्ता हुई। न जाने घर में क्या हुआ ! मैं सूचना मिलते ही घर के लिए चल पडा॰। घर पहुँचा तो यहाँ का तो नजारा ही बदला हुआ था। कुल-कुटुम्ब के लोग आचुके थे। फुफेरे भइयों की पत्नियाँ , जो सब मेरी बडी॰ भाभियाँ थीं ,आ चुकी थीं। वे मुझसे बहुत छेड॰-छाड॰ करती थी। मैं उनसे भागा फिरता था।परन्तु इस बार तो अवसर ही नया था। आते ही सबने मुझे घेर लिआ। हँसी - मजाक शुरू हो गया।

मैं कुछ समझने की चेष्टा ही कर रहा था कि माँ ने कहा कि तुम्हारी शादी होनेवाली है। मुझे आश्चर्य हुआ। 'शादी? और मुझसे जरा पूछा भी नहीं कि मुझे शादी करनी है या नहीं? और अगर करनी है तो लड॰की कैसी चाहिए।' माँ ने मेरी चिन्ता भाँपते हुए कहा - ' तुम चिन्ता मत करो। मैंने पता लगा लिआ है ।लड॰की अच्छी है।' मैं क्या कहता? मेरे पास कहने के लिए कुछ रह ही क्या गया था।

दूसरे दिन से मुझे सरसों के तेल मे ढेर सारा हल्दी घोल कर अवटन लगाया जाने लगा।यह क्रम कई दिनों तक चलता रहा । तरह - तरह के विधि -व्यवहार होने लगे। इसके साथ ही मेरी जिज्ञासा बढ॰ने लगी। मैं सोचने लगा कैसी होगी मेरी पत्नी! अब रात - दिन भिन्न - भिन्न रूपों में मुझे वही दिखाई देने लगी। पूरे शरीर में एक अजीब सी सुरसुराहट फैलती।

मैं अब वह नहीं रहा , जो था। मैं खुद ही समझ नहीं पा रहा था कि यह मुझमें क्या होरहा था। बस एक ही इच्छा शेष रह गयी थी कि मेरा विवाह अब शीघ्र हो जाए।

आखिर वह दिन भी आ ही गया।बारात की तैयारी होगयी जिसमें हमारे परिवार के एवं पिताजी के मित्र - परिचित मिला कर करीब पचास लोग ट्रेन से अगले दिन मेरे होनेवाले श्वसुराल में पहुँचे। वहाँ हमलोगों का भव्य स्वागत हुआ।साथ ही विवाह की तैयारी होने लगी।

मुझे उनके घर के आँगन में ले जाया गया, जहाँ मंडप सजा था। चारों ओर उनके परिवार के लोग बैठे थे। मंडप के बीच में दो आसन लगे थे और सामने पंडित जी विवाह कराने की तैयारी में थे। एक आसन पर मुझे बिठाया गया , मंत्रोच्चार से विवाह की शुरूआत हुई। थोडी॰ देर के बाद एक लाल कपडे॰ में पूरी तरह लपेटी किसी चीज को परिवार के दो लोग उठाए लिए आए और उन्होंने उसे मेरे बगलवाले आसन पर लाकर रख दिआ। पहले मैं समझ नहीं पाया , यह क्या है , परन्तु थोडी॰देर बाद उसमें होनेवाली हरकत से लगा कि यह मानव शरीर ही है। मैंने अन्दाज लगा लिआ कि यही मेरी होनेवाली पत्नी है। उसने अपने हाथ तक कपडे॰ से लपेट रखे थे।पंडित जी के आदेशों का पालन भी उसने पूरीतरह ढँके हाथों से किआ। कुछ देर बाद मेरा आसन बदल दिया गया। दाहिनी ओर मुझे बिठाया और बाई ओर मेरी पत्नीनुमा चीज को। इससे मैंने अन्दाज लगा लिआ कि मेरा विवाह हो चुकाहै। बाद मे मैंने उस पूरी तरह ढँकी काया के साथ गाँठ बाँध कर सात फेरे लिए। पंडित जी ने घोषणा करते हुए कहा कि अब आपलोग पति - पत्नी हुए। इस घोषणा के साथ ही मेरे परिवार के सारे लोगों को भीतर बुला लिआ गया।अब मुँह दिखाई कि रस्म शुरू हुई। सबने मुँह देखा , परन्तु ,मैंने नहीं।

रस्मों की समाप्ति के बाद रात हुई।यह सुहाग रात थी।इसके बारे में मेरी भाभिओं ने मुझे बहुतकुछ बता रखा था। मैं इस पल की प्रतीक्षा कर रहा था। कम- से -कम मुझे अपनी पत्नी को देखने का अवसर तो मिलेगा।किसी स्त्री को अबतक अकेले में मैंने न तो देखा था , न किसी को छुआ ही थी। मेरे लिए आज सबकुछ नया होने वाला था। मेरे भीतर कहीं बहुत घबराहट भी थी। कमरे की खाट पर पडा॰ मैं किसी नयी आहट की प्रतीक्षा करने लगा, परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वहाँ कोई नहीं आया। कौए बोलने लगे। इससे लगा सबेरा होगया। मुझे बहुत निराशा हुई , साथ ही मन में शंका भी हुई कि लड॰की के हाथ- पाँव मे कोई दाग तो नहीं !मंडप में भी वह पूरा शरीर ढाँके रही।रात में मिलने के लिए भी उसे भेजा नहीं गया!खैर , अब हो क्या सकता था। अब आशा थी कि आज उसकी विदाई होगी। वह हमोगों के साथ हमारे घर चलेगी। यहाँ नहीं देखा तो कम -से - कम उसे अपने घर तो देख सकूँगा! परन्तु यह भी नहीं हुआ। सबेरे उसके पिताजी ने बताया कि विवाह के बाद तीन वर्षो तक लड॰की की विदाई का उनके यहाँ रिवाज नहीं है। मुझे गहरी निराशा हुई। हमसब लोग लौट कर वापस आगये। मुझे यह अनुभव ही नहीं हुआ कि मेरा विवाह भी हुआ है। मेरी माँ इससे बहुत नाराज हुई। वह अपनी पहली बहू के स्वागत की पूरी तैयारी कर चुकी थी। खैर , मैं वहाँ से पुनः राँची लौट गया। मुझे यह अनुभव ही नहीं हुआ कि मेरा विवाह भी हुआ है।मेरे मित्रों को भी बहुत निराशा हुई।मैंने बडी॰ मुश्किल से स्वयं को सम्हाला और अपनी पढा॰ई में लग गया।

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Wednesday, September 28, 2011

Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 68

याद आता है गुजरा जमाना 68

मदनमोहन तरुण

मेरा विवाह

एक बार पिताजी एक सेमिनार में भाग लेने गये। वही एक अन्य डाँक्टर ने इनसे अपनी बेटी की बात चलाई और पूछा कि उन्हें यदि किसी योग्य लड॰के की जानकारी हो तो बताएँ। पिताजी ने कहा कि विवाह तो मुझे अपने लड॰के का भी करना है , जो अभी कालेज में पढ॰ता है। इतना सुनते ही दूसरे डाँक्टर बन्धु ने उनसे कहा कि ,भला इससे अच्छी और क्या बात होसकती है।और उन्होंने पूछा - 'यदि आप चाहें तो रिश्ता यहीं तय हो जाए।' मेरे पिताजी ने हामी भर दी और विवाह तय होगया। जब वे लौटकर आए तो उन्होने मेरी माँ को बताया। माँ ने आश्चर्य व्यक्त किया कि उन्होंने इतना बडा॰ निर्णय इतनी जल्दवाजी में कैसे ले लिया! माँ ने पूछा 'आपने लड॰की देखी नहीं तो यह कैसे पता चलेगा कि वह देखने में कैसी है ? सुन्दर या असुन्दर , गोरी या काली!' पिताजी ने कहा लडकी जरूर गोरी और सुन्दर होगी क्योंकि उसके पिताजी सुन्दर थे।' माँ नहीं रुकी। उसने पूछा - अगर वह अपनी माँ जैसी हुई तो! आपने उसकी माँ को तो नहीं देखा!। पिताजी चुप रहे। माँ ने मेरे होनेवाले श्वसुर जी का पूरा पता लेकर दूसरे दिन अपनी दो विश्वसनीय दासियों को लड॰की को देखने और मेरी होनेवाली पत्नी के बारे में पता लगाने को भेजा।दोनों दासियाँ दो दिनों के बाद सब पता लगाकर लौटीं और बताया कि लड॰की गोरी और सुन्दर है तथा कहीं से उसके बारे में कोई गलत -सलत जानकारी नहीं मिली है। सुनकर माँ को संतोष हुआ और उसने शादी पक्की करने के पक्ष में ऊपनी राय देदी। शादी की बात पक्की हो गयी और विवाह का दिन भी निश्चित कर दिया गया।

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Yaad Aataa Hai Gujaraa Jamaanaa 67

याद आता है गुजरा जमाना 67

मदनमोहन तरुण

घेरे के बाहर

हिन्दी के विवादास्पद उपन्यास ‘घेरे के बाहर’ के लेखक द्वारका प्रसाद जी रॉची में ही रहते थे।उन दिनों वे ‘नर – नारी’ और ‘हमारा मन’ नाम की दो अनूठी पत्रिकाओं का सम्पादन - प्रकाशन कर रहे थे। यह हिन्दी में सेक्स और मनोविज्ञान की प्रत्रकारिता के क्षेत्र में पहला गंभीर प्रयास था जिसे पाठकों ने पढ़ा और सराहा।द्वारका प्रसाद जी को अन्य लेखकों ने विजातीय बना रखा था क्योंकि उनके उपन्यास का विषय था भाई - बहन के बीच सेक्स – सम्बन्ध।’घेरे के बाहर’ में इस विषय के पक्ष में दुनिया भर के ऐसे सम्बन्धों का उदाहरण देकर इसकी वकालत की गयी थी।द्वारका प्रसाद जी इन चीजों से बेपरवाह अपने परवर्ती साहित्य में भी अपनी बातें निर्भीकतापूर्वक रखते रहे। कहा जाता है कि यह द्वारिका प्रसाद जी के निजी जीवन से सम्बद्ध उपन्यास है। इस उपन्यास में कथा के विकास पर ज्यादा जोर न देकर इस सम्बन्ध को जायज ठहराने की कोशिश अधिक की गयी है।

इस उपन्यास के चर्चित होने का मुख्य कारण इसका विषय था। उपन्यास कला की दृष्टि से यह बहुत महत्वपूर्ण उपन्यास नहीं कहा जा सकता किन्तु हिन्दी में यह एक अनूठा और साहसपूर्ण उपन्यास है।

साहित्य हर विषय पर विचार करने के लिए खुला मैदान है।

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